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कविता- मेरी सुहागरात...(कान्टेस्ट)

Posted On: 20 Jan, 2014 कविता,Contest में

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मेरी सुहागरात

उस रात जिंदगी

मुझसे मुखातिब हुई

मुस्कराई करीब आई

बाँहों में जा समाई

हम-बिस्तर…. हम-बदन हुई

जैसे कि हों एक जान

एक ही जिस्म भी!

गुजरती रात के साथ

हम इठलाते रहे

सहलाते-गुदगुदाते रहे

एक दूजे के / अपने ही से

जिस्मों को

साँसें, धड़कन, छुअन, सिहरन

हर अहसास से

मिलन का / दो से एक होने का

इत्मीनान तलाशती सी अंगुलियाँ

थिरकती रही जिस्मों पर ….

वक्त थमा नहीं

रात ढलती रही

देर किसी पहर

कौंधे किसी प्रश्न ने शायद

सहलाने, गुदगुदाने को

कुरेदने में बदला होगा

जिस्मों सी नजदीकी को

दिलों में ढूँढना चाहा होगा…

शायद

खुशनसीबी पे गुमाँ की चाहत ने

सहलाते, गुदगुदाते

….कुरेदते हुए जिस्मों को

जज्बातों को

अहसासों को

जख्मी कर डाला

जिस्मों पर

जज्बातों पर

गहराते जख्मों की चीर-फाड़ से

सुबहे सेहतमंद होते रहे.

यकीं तिनका-तिनका बिखरता रहा

सुलगे हुए जज्बात

धुआं बन उड़ते रहे

नाजुक से अहसास दम तोड़ते रहे

सुबह

सलवटों से अटी

मसली हुई चादर पर

अनमने, अलहदा, खामोश,

….बेजान जिस्म

बीती रात की ‘रंगीनी’ के

राज खोल रहे थे!

(निवेदन- मित्र: मेरी वर्तमान परिस्थितियां, मुझे सीमित दैनिक स्वाध्याय के पल ही उपलब्ध करा पा रही हैं…
ब्लागों पर जाकर पठन-पाठन और प्रतिक्रिया सम्भव ना हो पाने के कारण,
मंच के सभी ब्लागगर मित्रों के प्रति सम्मान सहित
मेरे नये ब्लाग पोस्ट पर केवल त्वरित टिप्पणियाँ(स्टार रेटिंग) ही सक्षम हैं!
क्षमायाचना सहित प्रतिक्रिया की लिंक अक्षम रखी गईं हैं!)
-चर्चित

२०/०१/१४ ७:३४:४८



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