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वो बेनाम सर्व शक्तिमान !-1

Posted On: 20 Nov, 2011 Celebrity Writer में

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वो बेनाम सर्व शक्तिमान !-1

[आग्रह - सम्पूर्ण लेख को पढ़कर ही अपना मत निर्धारित करें ]

.
आज दुनियां में सर्वाधिक विकसित समाज निर्विवाद रूप से ईसाई धर्माब्लाम्बियों का ही है !
क्यों ???
क्योंकि -
ईसाईयों ने उस सर्वशक्तिमान की सत्ता को तो स्वीकार किया है किन्तु
उसे अपने मतानुसार किसी नाम में आवद्ध नहीं किया है !
उनमें भी धर्मांध हैं !
उनमें भी कट्टरपंथी हैं किन्तु में उनकी इस नकारात्मकता की नहीं
शेष सकारात्मक की चर्चा करना चाह रहा हूँ !
उन्होंने किसी भी कारण से सही उस सर्व शक्तिमान का अपना कोई नाम नहीं रखा है !
वे स्थानीय प्रचालन के अनुसार जीजस को
परम पिता परमेश्वर की संतान ,
खुदा बाप के बेटे
या अन्य स्थानीय सर्वशक्तिमान के नाम वाले सर्व-व्यापी के बेटे के रूप में
प्रचारित, प्रदर्शित एवं प्रतिष्ठित करते रहते हैं !
[
यदि किसी पड़ौसी से यह कहा जाए कि
"तुम मेरी बात सुनो क्योंकि में तुमसे धन, पद, प्रतिष्ठा एवं निवास में बड़ा हूँ,"
तो वह आपको सुनने के स्थान पर आपका विद्राही बनेगा !
किन्तु यदि यह कहा जाए कि
"मेरी बात मानो,
मैं तुम्हारे पिता का बहुत चहेता,
बहुत निकटस्थ था,
बहुत वर्ष पहले जब तुम्हारा जन्म भी नहीं हुआ था,
तुम्हारे पिता मुझे अपने बड़े बेटे की सी मान्यता देते थे !"
दो चार प्रमाण भी दे
तो आप उसकी बात सुनने और आगे शायद मानने भी तत्पर हो जायेंगे !]
तो क्या ईसाईयों का अपना कोई भगवान है ही नहीं !
जी नहीं !
बात ऐसी है नहीं !
असल में वे नाम से अधिक काम से मतलब रखते हैं !
और यही उनके समाज का विश्व में अग्रणी होने का कारण है !

.

यहाँ तक तो बात हुई ईसाईयों की !

किन्तु मैं आपसे ईसाईयों की वकालत नहीं कर रहा हूँ !

ना ही इसाइयत का प्रचार मेरा उद्देश्य है !

.
मैं आपसे उस सर्वशक्तिमान के विषय में संबोधित हूँ ,

जिसे हम मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों, गुरुद्वारों,

या विभिन्न प्रार्थना घरों में ढूँढ़ते रहते हैं !

जिसके हमने विभिन्न नाम रख रखे हैं !

.


कोई राम,श्याम, शिव, विष्णु, ब्रम्हा विभिन्न नामों से भगवान् बुलाता है,
कोई खुदा कोई गाड कोई कुछ और
इनके मानने वालों के समुदाय के भी अपने नाम हैं !
हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई, पारसी,यहूदी आदि
अनेक मान्यता प्राप्त धर्म हैं दुनियां में !
अनेकों कबीले भी हैं !
इन धर्मों और कबीलों के कई उपबंध भी हैं-
आर्य समजी, मूर्तिपूजक, आनंद मार्गी, द्वैत, अद्वैत, के अतिरिक्त विभिन्न जातियों में बँटा हिन्दू समाज !
सिया सुन्नी, और क्षेत्रवादी पंथों में बँटे मुस्लिम !
सिख, मोना सिख अदि !
रोमन केथोलिक, प्रोटेस्टेंट में बँटे ईसाई !
दिगंबर, श्वेताम्बर जैन !
बौद्ध भी ऐसे ही किसी तरह बँटे नहीं हैं तो भी बँट ही जायेंगे कुछ दशकों में !
शेष धर्म, पंथ और कबीले भी इसी तरह बँटे हुए हैं !
सब के सब कट्टर अपने अपने सर्व शक्तिमान के प्रति !
सबके लिए केवल अपना सर्वशक्तिमान ही सत्य, सम्माननीय और पूज्य शेष अन्य हेय !
अधिकांश का सर्वशक्तिमान इस दूनियाँ से बाहर कहीं रहकर सकल प्रकृति का संचालक !
कुछ की मान्यता कहती है कि कहीं कोई सर्वशक्तिमान जैसा कुछ है ही नहीं !
जो हैं हम हैं !
जो हमारे समक्ष है वही सच है !
तो सच क्या है ?
क्या सब कपोल कल्पित ही है ?
यदि कपोल कल्पित है तो
यह दुनियां कायम कैसे है ?
जन्म के लिए प्राण कहाँ से आते हैं
और मृत्यु में शरीर से क्या निकल जाता है !
इससे भी आगे चन्द्रमा, पृथ्वी, सूर्य, मंगल आदि ग्रहों की आपस की दूरी में सामंजस्य कैसे है !
हमारे सौर मंडल से अन्य सौर मंडल क्यों नहीं टकराते ?
कितनी आकाश गंगाएं हैं हमारे ब्रम्हांड में ?
कितने ब्रम्हांड हैं आकाश में ?
कितना विस्तारित है आकाश ?
यदि सबके तार्किक उत्तर आपके पास हैं,
तो सच में कहीं कोई सर्वशक्तिमान नहीं है !
किन्तु
अभी तक तो कोई उत्तर किसी के पास नहीं है !
आगे आने वाले सैंकड़ों सालों में हो भी नहीं पायेंगे !

तब तो निश्चय ही कही कोई ताकत /

कोई शक्ति है जो यह सब संचालित कर रही है !

क्या उस शक्ति,

जिसकी रचना का ओरछोर ही पता ना हो,

का रूप हम निर्धारित करेंगे ?

नाम हम रखेंगे ?

उसे मानने पूजने के तरीके हम सब पर थोपेंगे ?
क्या हम विभिन्न समुदायों के मानने वाले केवल अपने समुदायों के लोंगों को ही सच्चा
और शेष सभी को झूठा मानने की योग्यता रखते हैं ?
जब हमारे समुदाय के गुरु ज्ञानी और सच्चे हो सकते हैं
तो दुसरे समुदाय के क्यों नहीं ?
यदि हमारे समुदाय के मुखिया के करोड़ों समर्थक हैं तो दुसरे समुदाय के साथ भी ऐसा ही है !
फिर केवल हमारा पूर्वाग्रह ग्रसित विशवास ही क्यों सच्चा है ?
द्सरे का क्यों नहीं ?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढिये ?
यदि मिल जाएँ और आप मुझे दे पायें
तो मैं आपके समुदाय का / आपके पंथ का हो जाउंगा !
नहीं मिलें तो मेरे समुदाय को जानने समझने की जिज्ञासा को कुछ दिन सम्हाल कर रखियेगा !!!
मेरा समुदाय , सम्प्रदाय, पंथ भी बिलकुल आपके पंथ जैसा ही
माननीय, पूजनीय और अनुकरणीय मिलेगा आपको !
वादा है आप सबसे मेरा !!!
प्रतीक्षित रहिये ………!

(चाहें तो इस ब्लॉग को फालो कर रखिये ताकि जागरण जंक्शन मेरी हर नई रचना के पोस्ट की सूचना आप तक पहुंचा सके )



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
November 22, 2011

श्रद्धेय चित्रांश जी ,.सादर प्रणाम पढ़कर शब्दहीन सा हो गया हूँ ,..नमन आपको

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 22, 2011

    मित्र; मैं जानता हूँ इस लेख को लिखते समय ईश्वर ने मुझ से आम आदमी को विचारों के भण्डार से आशीषित कर रखा था ! बस उसके ऐसे आशीषित वरद हस्त से ही मैं स्वयं को मालामाल समझता रहता हूँ ! अन्यथा, इंसान की औकात नहीं है उसे समझने का दावा करने की !

shashibhushan1959 के द्वारा
November 21, 2011

मान्यवर चित्रांश जी, सादर. मैं इन्तजार में हूँ.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 21, 2011

    मित्र; लगता है ‘खुदा बाप’ की शुरुआती लाइनों में ईसाइयों की महत्ता देख “मंच ” की तरह आपने भी आगे पढ़ना जरूरी नहीं समझा ! उत्तर देने की कोशिश की है, देख लीजियेगा !

    shashibhushan1959 के द्वारा
    November 22, 2011

    मान्यवर चित्रांश जी, सादर. “”इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढिये ? यदि मिल जाएँ और आप मुझे दे पायें तो मैं आपके समुदाय का / आपके पंथ का हो जाउंगा ! नहीं मिलें तो मेरे समुदाय को जानने समझने की जिज्ञासा को कुछ दिन सम्हाल कर रखियेगा !!! मेरा समुदाय , सम्प्रदाय, पंथ भी बिलकुल आपके पंथ जैसा ही माननीय, पूजनीय और अनुकरणीय मिलेगा आपको ! वादा है आप सबसे मेरा !!! प्रतीक्षित रहिये ………!”" . आपका आकलन सही नहीं है.लेख पड़ने के बाद भी मुझे लगा की आभी कुछ बाकी है, तभी आपने प्रतीक्षित रहने को कहा है.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 22, 2011

    मित्र; मंच पर चर्चित ब्लॉग लेखक वे हैं जो किसी वर्ग विशेष के विरोध में या ऐतिहासिक तथ्यों पर या एक पक्षीय आलोचक हैं ! यहाँ ‘ जय हिंद ‘ शब्द के उपयोगकर्ता को कांग्रेसी, वन्दे मातरम् वाले को संघी, भ्रष्टाचार विरोधी को अन्ना ग्रुप का, इस्लाम / ईसाइयत के किसी गुण के उल्लेखकर्ता को ( “त्याज्य ” ) उदारवादी समझा जाता है ! मेरे मत में कुछ भी पूर्ण अंगीकार योग्य उत्तम नहीं हो सकता ना ही पूर्ण गुणहीन त्याज्य ! इसी तरह मौन भी पूर्ण सन्देश की अभिव्यक्ति में समर्थ है और आजीवन धाराप्रवाह उद्वोधन भी अपूर्ण ! फिर जिस विषय पर लिखने का प्रयास है वह इतने कम शब्दों में अपनी उद्देश्य पूर्ती में अक्षम है तो कुछ भी अनहोना नहीं ! आपकी जिज्ञासा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से बताना चाहूँगा की मेरा पंथ मानवता वादिता एवं यथार्थ वादिता !


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