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"सम्मान ? ह्त्या "-jagran junction forum

Posted On: 7 Nov, 2011 Celebrity Writer में

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‘सम्मान ‘ ? ह्त्या !

यानी आनर किलिंग शब्द ही हास्यास्पद लगता है
जब
इसका प्रयोग सम्मान की रक्षा हेतु किये गए कृत्य से जोड़कर अर्थ निकाला जाता है !

क्योंकि मुझे इसका कारण उपस्थित होना तो सम्मान की हत्या ही लगता है


किन्तु निवारण….

उसी सम्मान की जिसकी रक्षा हेतु यह कृत्य (यानी  ह्त्या ) किया जा रहा है,

का उस कारण से भी बड़ा असम्मान लगता है !

यानी यदि कारण का उपस्थित होना सम्मान ह्त्या है

तो निवारण संगसार कर ह्त्या किया जाना !

यदि दुर्भाग्यवश कारण उपस्थित होकर सम्मान को मृत्यु तुल्य आहत कर ही चुका है

तो

उसको पत्थरों से पीट-पीट कर मारना कहाँ तक उचित है !

केवल मरते हुए सम्मान को उसी के हाल पर छोड़ दिया जाए ….

शायद गुजरता समय चोट का दर्द सहने और उससे उबरने का मरहम बन सके !

वीर व्यक्ति बड़ी बड़ी चोट आसानी से सहन कर मृतप्राय से जीवित हो उठते हैं

अथवा हँसते हँसते मर जाते हैं !

किन्तु अधीर व्यक्ति

ना जी पाते हैं ना हंसकर मृत्यु का वरण !!!

2.क्या सम्मान की रक्षा व्यक्ति के जीवन से ज्यादा जरूरी है?

3. ऐसी हत्या करने से सम्मान की रक्षा होती है या सम्मान खत्म होता है?

4. ऑनर किलिंग को रोकने के लिए कौन से कदम उठाए जा सकते हैं?

जैसे प्रश्नों का उत्तर इस लेख में

(पिछले वर्ष लिखे लेख को परिस्कृत कर)

प्रस्तुत करने का प्रयास है ! कितना सफल यह तो आप ही बता सकेंगे !

दबंग ! दौलतवाले या दिलवाले ?

तथाकथित ‘ सम्मान ह्त्या ‘ के कारक तथा कथित ‘ दबंग ‘ क्या वास्तव में दबंग शब्द के योग्य हैं ?

{आनर किलिंग के सन्दर्भ में दबंगों की करतूत उनकी कायरता की परिचायक है .

ना कि साहस की !

ये इतने डरपोक होते हैं की इनमें ऐसे लेख पढ़ने तक का साहस नहीं होता .

यदि आप भी उनमें से एक हैं या नहीं हैं तो भी आइये थोडा साहस जुटाएं

और चर्चा करें कौन कहाँ गलत है ?

मेरे नजरिये को पढ़कर आप भी सुधार पर सोचे बिना नहीं रह सकेंगे !

यह वादा है मेरा, आपसे .!!!

बस पूरा लेख पढ़िये और “सुधार को ” एक अवसर दीजिए !

विगत दिनों हुए और लगातार होते जा रहे ‘आनर किलिंग ‘ के प्रकरणों

को पढ़कर मेरे अपने आसपास घटित कुछ घटनाएँ याद आती हैं

जिनमें किसी एक की नहीं जाने कितने संबंधितों की हत्या एक साथ कर दी जाती है जैसे-

मेरे पड़ौस में ३-४ मकान छोड़कर एक प्रतिष्ठित ,शिक्षित, प्रगतिवादी और उदार परिवार

सिंह साहब का भी रहता है . सिंह साहब के छोटे से सीमित परिवार में दो बेटे थे .

उनका बड़ा बेटा जब महानगर में कॉलेज में पढ़ रहा था तभी उसे एक भली लड़की से

प्रेम हो गया. चूँकि लड़की विजातीय थी अतः दोनों ने समाज से छुपकर विवाह कर लिया.

सिंह साहब थोडा दुखी हुए किन्तु फिर उदारता दिखाते हुए

बहु को बेटी की तरह अपना भी लिया.

बहु को उचित सम्मान व स्नेह के साथ साथ अपनाया !

मांसाहार जैसे आग्रह अपनी शाकाहारी बहु से,

अपने बच्चों कि ख़ुशी पर ध्यान देने के कारण

ना करना ही उचित समझा

किन्तु कुछ ही महीने यूँ हँसते हँसाते गुजरे होंगे कि एक दोपहर अचानक उस हिन्दू

लड़की के पिता और भाई ने अपने १०- १२ शुभचिंतकों के साथ आकर हंगामा किया

और ‘खान साहब कि बहु ‘ को जबरन उठाकर जीप में डालकर ले गए. खान साहब

का समाज तो पहले ही नाराज था सो खान साहब हाथ मलते रह गए . कुछ दिनों बाद

बहु की ओर से लड़के पर अपहरण व बलात्कार का केस दर्ज कराया गया ,उस लड़की

यानी खान साहब की बहु का कहीं ओर किसी सजातीय ‘वर’ से विवाह {अंतिम संस्कार }

कर दिया गया .खान साहब का बेटा मनोचिकित्सक का ग्राहक बन गया, खान साहब का

हँसता खेलता परिवार बेटे के सच्चे प्रेम

और खुद उनकी उदारता की भेंट चढ़ गया.

{कई शर्माजी , वर्माजी , खन्नाजी की कहानी भी इस सच्ची घटना जैसी ही होती हैं }

वास्तव में समस्या का मूल हमारी अधकचरी मानसिकता है.

हमें हमारे स्थापित सामाजिक मूल्यों में पश्चिम का

आधा अन्धानुकरण तो गौरवान्वित करता है

किन्तु

आधे से थोडा अधिक अनुसरण शर्मिंदा कर देता है .

आज हर किसी आम ओ खास को अपने बेटे बेटियों के उत्तम भविष्य को ध्यान में रखकर

शिक्षा के लिए और शिक्षित होने पर नौकरी के लिए अपने गाँव / कस्बों

से बाहर शहर भेजना ही होता है . कभी कभी तो विदेश भी !

हर कोई मजबूर है चाहे वह रूढ़िवादी दबंग हों या

प्रगतिवादी .

अधिकांश पढ़ने वाले बच्चे बिना कोई ‘गुल’ खिलाये अपनी शिक्षा पूरी कर अपने परिवार की शान में

चार चाँद लगाने में सफल रहते हैं.

कुछ अपना प्रेम पाकर सफल वैवाहिक जीवन जीने में

किन्तु कुछ, ऐसे दुर्भाग्यशाली होते हैं

कि उनके जीवन में प्रेम दिखावे के रूप में

अभिशाप बनकर आता है.

फिर चाहे वह दिखावा उनके जन्म से लेकर युवावस्था

तक उनके माता पिता की ओर से रहा हो

या यौवन के क्षणिक आकर्षण के रूप में या उनके प्रेम को ना समझ

पाने की कमजोरी का फायदा उठाने की कोशिश करने वाले किसी छलिया की ओर से …..

हमने आधा अधूरा आधुनिकता का अन्धानुकरण कर रखा है अन्यथा हमारी

भारतीय संस्कृति के पुरातन{?} प्रचलन मैं संतान के सयाने होते ही उचित

वर/वधु खोज विवाह देने की व्यवस्था थी.

विशेष परिस्थितियों में ब्रम्हचर्य के पालन की आवश्यकता की दशा में

विशेष इयम, नियम, संयम,आहार, विहार,
प्रत्याहार भी सुझाये गए थे .

जिनमें छात्र-छात्राओं {एवं विधवाओं-विधुरों} को सर मुंडवाना,योग-ध्यान व्

व्यायाम करना , तेल मसाले रहित सादा भोजन करना , सादे वस्त्र पहनना,

दर्पण ना निहारना , श्रृंगार एवं नर्म बिस्तर का निषेध ,अल्प निद्रा

आदि ब्रम्हचर्य पालन में सहायक सख्त नियम प्रस्तावित थे.

जबकि आज के विद्यार्थी विशेषकर

संपन्न घरों के { दबंगों के} बच्चे इन नियमों के ठीक उलट रहन सहन के आदि होते हैं.

सम्पन्नों को अपनी

संतानों का ऐसा विपरीत आचरण गौरवान्वित करता है.

जबकि आप भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने वाले

विद्यार्थियों में सादगी पसंद व अनुशाषित विद्यार्थियों का प्रतिशत ही अधिक पाते होंगे.

विकास की प्रक्रिया में परिवर्तन का सहज अंगीकार होना ही चाहिए.

कोई और विकल्प दिखता ही नहीं .

इस प्रगतिवादी युग में ना तो संतान को सयाने होते ही विवाह देना उचित है और ना ही ब्रम्हचर्य

हेतु सुझाये गए नियमों का पालन करवाना संभव .

अतः इस प्रगतिकारक युग में हमें भी या तो परिवर्तित होने तत्पर रहना होगा

या

थोडा संयमित ! थोडा सीमित !

क्योंकि आज के प्रतिस्पर्धी समय में किसी भी आय वर्ग के पालक अपनी कन्या का

१८ वर्ष की आयु में विवाह करना भी चाहें तो उचित वर कहाँ से लायें ?

हर विवाहोच्छुक युवा {युवक व युवती दोनों  ही } को कार्यरत और उच्च शिक्षित जीवनसाथी

की ही तलाश रहती है और भी अनेकों कारण हैं कि आज के समय में विवाह की आयु २५ से ३५ वर्ष के

बीच रहती है .

जबकि इस प्रगत समाज में अच्छे खानपान ,

अखवार, टी व्ही, कंप्यूटर आदि उन्नत

शिक्षाप्रद व मनोरंजक साधनों के कारण

{यौन} परिपक्वता की आयु और भी घट गई है.

{ यह बताना तो जरुरी नहीं ही है कि बेटे- बेटी के सयाने होते ही विवाह करना इसलिए

आवश्यक नहीं सुझाया गया कि अब वे अधिक खाना खाने लगेंगे } .

ऐसे में सहज ही स्वस्थ अथवा विकृत विपरीत यौनाकर्षण का जन्मना प्रकृति अनुरूप

व स्वाभाविक है .विशेषकर घर से बाहर रह रहे युवाओं के लिए विपरीत लिंगी की

स्वच्छंद उपलब्धता कभी कभी सुविधाजनक / परिस्थिति जनक सामीप्य / यौनाकर्षण

के अवसर ले आती है .

ऐसे में यदि वे प्रेमी युगल विवाह जैसे पवित्र बंधन में बंधने स्वतः तैयार होते हैं

तो उनके इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए .

यह मात्र एक सहज स्वाभाविक घटित है .

ऐसी दशा में एक सच्चा मित्र ही अच्छा मार्गदर्शक हो सकता है.

समझदार माता- पिता अपनी संतान के सबसे सच्चे मित्र होते हैं.

अधिकांश सफल व्यावसायिक और वैवाहिक जीवन जी रहे युवाओं के

माता-पिता उनके अच्छे मित्र पाए जाते हैं, जो उनके पहले जिज्ञासु

प्रश्न से लेकर उनकी हर शंका / कुशंका के समाधान में, उन्हें राह

सुझाने में अपनी सर्वोत्तम क्षमता का उपयोग करते हैं. उनकी सफलता

के पीछे बड़ा कारण उनके माता-पिता का उचित मार्गदर्शन भी होता है.

सम्भ्रान्त परिवारों में पल रहे युवा अक्सर अपने माता-पिता से अपने

युवा साथियों के बिषय मैं हर छोटी बड़ी बात शेयर करते रहते हैं.उनके

बीच कोई आकर्षण जन्मता है या कोई अनचाहा हमउम्र अकारण निकट

आने की कोशिश कर रहा होता है तब वे अपने बड़ों से बेखौफ सलाह

मशवरा करने की स्थिति मैं होते हैं . ना तो उन्हें अपने खुद अपने

ना ही उस चाहे/ अनचाहे साथी के खूनखराबे का डर होता है .

क्योंकि उनके माता-पिता सभ्यता के दायरे में रहकर ही ऐसी

समस्याओं/ अवसरों में निराकरण सुझाते / निकालते हैं .

वे निःसंकोच हर परिश्थिति में अपनी संतानों के सर्वोत्तम मार्गदर्शक होते हैं .

यदि आवश्यक व उचित हुआ तो संभ्रांत परिजन उनके प्रेमी को स्वीकारने भी

तत्पर रहते हैं . समाज में उन्हें भी अकारण सामजिक विरोध जैसी समस्याओं

का सामना करना होता है किन्तु उनमें ‘ पराये ‘ समाज के स्थान पर अपने

परिजनों का साथ देने का साहस होता है .

इसके ठीक उलट तथाकथित दबंग ऐसे बिषयों पर अपने सामने

अपनी संतानों का मुंह खोलना भी अनुचित समझते हैं .

अधिकांश प्रेमविवाहों की असफलता के पीछे भयवश अपने

अभिभावकों का मार्गदर्शन ना ले पाना भी है .

मजे कि बात यह है कि आप मैं से जो तथाकथित दबंग हैं,

आपने अपनी जिस संतान के जन्म पर उत्सव किये ,

स्वयं से अधिक उसकी ख़ुशी का ध्यान रखा ,

उसकी हर उचित /अनुचित मांग पूरी करते रहे,

किन्तु उसकी जीवनसाथी चुनने की इच्छा आपको

इतना कठोर बना देती है कि आप अपनी दबंगता का उपयोग

अपने ही अंश के विरुद्ध करने तत्पर हो जाते हैं .

क्योंकि आपको सबल समाज का सामना करने की अपेक्षा

अपनी संतान, जो आपके सामने निरीह है , का दमन

करना आसान रास्ता होता है .

तभी तो अपनी बेटी या अपने बेटे की प्रेमविवाहित पत्नी के

गर्भाधान के उपरांत भी उसके विवाह को मान्यता देने

के स्थान पर गर्भसमापन का आदेश व आपकी दबंगी के

अनुरूप {?} {पुनः } विवाह का त्वरित निर्णय कर प्रयास

प्रारम्भ कर देते हैं.

या अपने उचित लालन पालन व मार्गदर्शन की असमर्थता की सजा

अपने ही अंशों को अपने हाथों मौत देकर , दे डालते हैं .

आप अच्छी तरह जानते हैं कि समाज कितना भी सबल हो

कितना भी प्रबल सामाजिक विरोध हो ,

सदैव क्षणिक होता है .

जैसे जैसे समय बीतेगा लोगों का विरोध ठंडा पड़ता जाएगा .

आप अपनी दबंगी का उपयोग अपनी संतानों के उचित प्रेम

के समर्थन में भी कर सकते हैं . किन्तु आपकी दबंगी का

उपयोग आप केवल निर्बलों पर ही करना जानते हैं .

आपमें वह साहस ही नहीं कि आप अपनी युवा संतानों के प्रेम प्रसंग

के उचित होने की सम्भावना पर विचार कर सकें .

बड़े दुर्भाग्यशाली होते हैं वे लोग जो युवा होते होते अपने

माता-पिता के स्नेह से धीरे धीरे वंचित होते जाते हैं .

आपके संस्कारों की ही कमी होती है कि आपकी संतान आपके डर से

चोरी छुपे छोटे छोटे से शुरू कर बड़े अनैतिक काम करने लगती है .

आप हद से अधिक डरपोक और स्वार्थी होते हैं अपना स्वार्थ सिद्ध

करने के लिए आप अपना कुछ भी दाँव पर लगाने तत्पर रहते हैं .

अपनी संतान भी !



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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
November 10, 2011

बहुत अच्छी व्याख्या आपने की है चित्रांश जी.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    निशा जी; अनेकानेक धन्यवाद् !

abodhbaalak के द्वारा
November 9, 2011

चित्रांश जी आपने बड़ी ही कुशलता के साथ अपने विषय के साथ न्याय किया है सोचने पर विवश करती रचना http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    प्रबुद्ध मित्र; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) यदि आप की यह राय है तो लेख की उद्देश्य पूर्ती हुई !

akraktale के द्वारा
November 8, 2011

आदरणीय चित्रांश जी नमस्कार, बहुत ही विस्तार से आपने विषय को समझाया है या ये कहने आपने आनर और किल्लिंग को विभाजित किया है.साधुवाद.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    मित्र ; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) जी आपका कथन बिलकुल सटीक है ! वास्तव में घटना के होने में हर कोई परवश होता है किन्तु उसके निराकरण के समय उसका विवेक स्थिर रह सके तो आनर अक्षुण रह सकता है और किलिंग असंबंधित !

alkargupta1 के द्वारा
November 8, 2011

अर्थपूर्ण आलेख…..बहुत कुछ आदमी सोच पर निर्भर करता है…..मुझे लगता है यहाँ हमारी सकारात्मक सोच की अहम् भूमिका होती है…….!

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    मित्र अलका जी; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) निश्चय ही हमारी सोच अधिक जिम्मेदार होती है , हर मामले में ! हमारे घटित पर सर्वाधिक हम ही शर्मिन्दा/ गौरवान्वित होते हैं ! हर प्रत्यक्ष से मनगणंत प्रश्न प्रत्याशित भी हम ही होते है ! कई बार तो अनावश्यक स्पष्टीकरण कर सूचना प्रसारक भी ! पुनः धन्यवाद् !

mparveen के द्वारा
November 8, 2011

चित्रांश जी नमस्कार, ये जो ओनर कीलिंग हो रही है वो कह रहे हैं की सम्मान के बचाव में हो रही हैं लेकिन क्या उस किल्लिंग के बाद उनका सम्मान कायम रह जाता है . प्रेम करना कोई पाप नहीं है . अगर प्रेम करना बदनामी है तो ओनर किल्लिंग कोन सा सम्मान का सूचक है बस लोगो की सोच ही विपरीत है … धन्यवाद

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    मित्र परवीन जी; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) जी हाँ ; ठीक यही विषय भी है और वस्तु भी ! उचित लगे तो प्रोमोट कीजिए !

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 7, 2011

http://swasasan.jagranjunction.com/?p=468 पूज्यनीय चित्रांश जी …..सादर प्रणाम ! इस समाजिक बुराई के खिलाफ सरकार तो सक्रिय है लेकिन हमारा समाजिक ताना बाना ही उलझा हुआ है ….. शिक्षा का बढ़ता हुआ प्रतिशत भी शायद लोगों की पिछड़ी हुई सोच में सकारात्मक बदलाव शायद ही उस स्तर तक ले आये जितना की होना चाहिए ….. भला तो ऐसे कुक्र्त्य करने वाले और इसका शिकार होने वाले दोनों का ही नहीं हो पाता है ….. आपके इस लेख की जितनी भी तारीफ की जाए वोह कम ही होगी -इन पर अमल किया जाए तो ही हमारे समाज को खुशहाल और सुखी बनाने में हम अपना बनता योगदान दे सकेंगे …. मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/05/“भ्राता-राजकमल-की-शादी”/

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    अनुजमित्र ; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) यदि लेख महत्वपूर्ण एवं उपयोगी प्रतीत हुआ तो आप इसके उद्देश्य में सहभागी बनिए और आपके सम्बंधित मंचों पर (मेरे नाम के उल्लेख के बिना भी ) उद्धृत कीजिए !

shashibhushan1959 के द्वारा
November 7, 2011

बात कुछ भी नहीं है, बात में फिर भी दम है, नदी गहरी तो बहुत है, मगर पानी कम है. मान-सम्मान के भी रूप अब बदलने लगे, हम से है ये समाज, इस समाज से हम हैं.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    मित्रभूषण जी; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) समाज की महत्ता से किसी को कोई अस्वीकार नहीं हो सकता किन्तु इस समाज की इकाई तो हम ही हैं ना ?

    shashibhushan1959 के द्वारा
    November 10, 2011

    आदरणीय चित्रांश जी, सादर. औकात  हमारी  पत्ते सी,  और महावृक्ष है यह समाज, जब   सामंजस्य  नहीं  होगा, बेसुरे  लगेंगे  साज-बाज. जो समय-चक्र है घूम रहा, संग-संग चलना है मजबूरी, मन समझ न पाए रखे पास किसको, किस से रक्खे दूरी. अभिवादन.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    मित्र; पूर्ण सहमती ! जिस तरह राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्नाजी गांधी अवतार के रूप में प्रकट हुए उसी तरह सामाजिक कुरीतियों / सामाजिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध किसी राजा राम मोहन राय के अवतार की आवश्यकता है !

Amita Srivastava के द्वारा
November 7, 2011

चित्रांश जी अच्छा आलेख , बहुत दिनों बाद दिखाई दिए |

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 10, 2011

    अमिता जी; अनेकानेक धन्यवाद् ! प्रत्युत्तर में देरी की धृष्टता एवं अनियमित उपस्थिति हेतु क्षमा ! (विभागीय स्थानान्तरण की प्रक्रिया में ट्रेन पकड़ने जाने के २० मिनट पूर्व भागमभाग में ब्लॉग पोस्ट किया था, तब से आज मंच पर उपस्थित हो सका हूँ !) अच्छा लगा तो आपके सम्बंधित मंचों पर प्रोमोट कीजिए (बिना मेरे नाम के उल्लेख के भी/ यानी कॉपी पेस्ट द्वारा)


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