स्व सा सन्

जागो मृतप्राय ... जागॊ--ऒ---ऒ !!! प्रगति का आधार - ईमानदार विचार!

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मैं और मेरा देश

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अक्सर हम हमारे देश और समाज की कुरीतियों, कुशासन कुप्रबंधन , कुप्रथाओं

और कपट आदि पर खुलकर खुन्नस निकाल रहे होते हैं ! हमारी इस हरकत के हामी

हमसे हमारे कई साथी भी मिल जाते हैं किन्तु ….. कभी खुद अपने आप पर सोच

कर भी देखा जाए !

हमारे देश , समाज, गाँव , शहर, कुल , परिवार और खुद अपनी दुर्दशा के दोषी

स्वयं हम भी कम नहीं निकलेंगे !

उससे भी बढ़कर बिडम्बना यह की हमेशा सुधरने की अपेक्षा दूसरों से , सुधार

की अपेक्षा दूसरों से , क्रान्ति की शुरुआत की अपेक्षा दूसरों से,

आन्दोलन / समर्थन / सहयोग की अपेक्षा भी दूसरों से ही किन्तु उपभोग के

समय हम खुद को सबसे बड़ा अधिकारी मानते हैं !

क्यों ????????????????????????

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
September 29, 2011

चित्रांश जी इसी क्यों में तो सारी समस्या का ……………….. अगर इसको हम जान ले नतो …… कम शब्दों में बड़ी बात http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Charchit Chittransh के द्वारा
    October 6, 2011

    मित्र ; धन्यवाद ! हमारी वर्तमान व्यवस्थाओं में सच की राह पर चलने वाला परिजनों को ख़ुशी दे सके यह तो संभव ही नहीं किन्तु मूल आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु ही संघर्ष में विगत दिनों अति व्यस्त रहने के कारण मैं मेरे अपने ब्लॉग par deri से आ सका ! देरी के लिए क्षमा …..

Santosh Kumar के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीय चित्रांश जी ,.सादर प्रणाम बिलकुल सही कहा आपने ,..यह सवाल सबको अपने आप से जरूर पूछना चाहिए,..कभी न कभी गलती तो सब करते हैं,..यही मानव स्वभाव है लेकिन अब हमें आत्ममंथन करके सुधार की राह पर चलना चाहिए ,.इसी में हमारा ,समाज और देश का हित है ,.. कभी समय मिले तो मेरे ब्लाग पर नजर डालने की कृपा करें ,….आपकी एक विस्तृत विवेचनात्मक प्रतिक्रिया मेरे मानस पर अंकित है ,…पुनः प्रणाम http://santo1979.jagranjunction.com/

    Charchit Chittransh के द्वारा
    September 28, 2011

    मित्र; इस मंच पर हम सभी ब्लॉगर बुद्धिजीवी स्तर के हैं ! सभी सब कुछ जानते और समझते हैं किन्तु फिर भी कई बार काफी कुछ हमारी नज़रों में आने से रह जाता है ! ऐसे में कभी आप कभी मैं या कभी कोई और हमारे सामने वह तथ्य ले आता है ! बस यह ‘ कमेन्ट ‘ (ब्लॉग रचना कहना अनुचित होगा ) भी कुछ ऐसा ही है ! धन्यवाद् !

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीय चर्चित जी ….सादर प्रणाम ! आपकी बात से दसवी कक्षा में पढ़ी हुई एक लाइन याद आ गई की हमे यह नहीं देखना चाहिए की भारत हमारे लिए क्या कर सकता है –बल्कि इसकी बजाय हमको यह देखना चाहिए की हम भारत के लिए क्या कर सकते है” धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/25/“वेश्यावृत्ति-को-कानूनी/

    Charchit Chittransh के द्वारा
    September 28, 2011

    मित्र; बहुत दिनों के बाद आपकी संजीदा प्रतिक्रिया मिली ! धन्यवाद् !


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