स्व सा सन्

जागो मृतप्राय ... जागॊ--ऒ---ऒ !!! प्रगति का आधार - ईमानदार विचार!

72 Posts

422 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 4241 postid : 404

हिंदी के दुश्मन खुद हिंदी भाषी !- १ एवं २

Posted On: 14 Sep, 2011 Celebrity Writer में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

SwaSaSan Welcomes You…
हिंदी के दुश्मन खुद हिंदी भाषी !
1- (कैसे ), २ (क्यों )
हिंदी दिवस पर…
हिंदी की दुर्दशा के दोषी हम हिंदी भाषी स्वयं ही हैं !
जी हाँ ! मैं मेरे सिद्धांतों के विरुद्ध आज इस अवसर पर नकारात्मक कहने को विवश इसीलिये हूँ की आज के दिन शायद हिंदी में लिखा हुआ पढ़ने में हिंदी भाषियों को रूचि हो !
ये मेरा फलसफा नहीं कटु अनुभव बोल रहा है !
आपको प्रसंगवश बताना आवश्यक है की मेरे लिखे लेख ‘ मेरा राज देश पर तो देश का दुनियां पर ‘ के लिए मुझे ‘ राष्ट्रीय रत्तन अवार्ड -2009 ‘ हेतु ‘ सिटिज़न्स इंटीग्रेशन एंड पास सोसाइटी इंटर्नेशनल ‘ द्वारा आमांकित किया गया था . ( इस संस्था का मुख्यालय USA में है और लेख के अंश SwaSaSan पर ) . मैं अर्थाभाव -वश समय पर ना तो फोटोग्राफ आदि जानकारी भेज सका ना समारोह में सम्मिलित होने दिल्ली तक जा सका ! किन्तु इस नामांकन से प्रेरित हो मेरा ब्लॉग स्वशासन और बाद में वेबसाइट ( हिंदी ) शुरू की ! पिछले 16 ऑक्ट 2010 से आज तक मेरे ब्लॉग पर कुल लगभग 980 क्लिक हुए हैं ! मुझे मेरे ब्लॉग के इन आंकड़ों के विश्लेषण से आश्चर्य दुःख और घोर निराशा होती है ! इसीलिये नहीं की गिनती में कम हैं वरन इसलिए कि इनमें से आधे से अधिक विदेशों से हैं ! मुझे दुःख है कि कनाडा और USA की एक से अधिक वेबसाइट मेरा प्रचार कर प्रोत्साहन का प्रयास करती हैं ! सबसे ज्यादह USA में मुझे पढ़ा जाता है !
चलिए बात यहीं तक होती तो भी ठीक था किन्तु आगे जो लिखने जा रहा हूँ वह या तो मेरा दुर्भाग्य है या हमारे कुंठाग्रस्त समाज की विकृत बिडम्बना !
मई मार्केटिंग में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चूका हूँ तो निश्चय ही मेरा परिचय क्षेत्र विस्तृत होगा ही ! मेरे परिचय क्षेत्र के लगभग हर व्यक्ति से ( जो हिंदी और नेट की समझ रखते हों )
ब्लॉग पर जाकर पड़ने और उनकी समस्याओं के समाधान पाने का विश्वास दिलाया किन्तु …. करीब 3-3.5 हजार लोंगों में से किसी से भी या तो ब्लॉग पर जाना नहीं हो पाया या आधे से अधिक ने हिंदी ठीक से समझ ना आने की विवशता जताई !
मुझे लगा शायद हमारे देश में इन्टरनेट के प्रति जागरूकता की कमी है इसीलिये लोगों की रूचि कम है सोचकर मैने मेरे बहु-उपयोगी ढाई पेज के लेख ‘ सुख के साधन ‘ की 50 प्रतियाँ छापकर मेरे कार्यालयीन सहयोगियों और परिचितों में से केवल उन जरूरतमंदों को दी जिन्हें इसकी पढ़ने की सख्त जरूरत मुझे महसूस हुई ! पिछले 6 माह में से केवल 2 व्यक्तियों ने ही पढ़ना स्वीकार किया ( कहा हाँ यही सच है सुख हमारे अपने हाथ में है हमारे गुरूजी भी यही कहते हैं ) शेष 48 को ढाई पेज पढ़ने का समय नहीं मिल पाया ! और इनमें वे लोग भी शामिल हैं
जो मार्गदर्शन लेने ही मेरे पास आये थे !
अधिकांश लोग अपने बच्चों की समस्या मेरे सामने रखते हुए सलाह के रूप में ( मुफ्त )ऑनलाइन ब्लॉग बच्चे को पढ़वाने की सलाह शुरू से नकारते हुए बहुत इतराते हुए कहते हैं -
” हिंदी में है ? हमारे बच्चे तो हिंदी के नाम से ही चिड जाते हैं !”
” शुरू से इंग्लिश मीडियम में ही पढ़े हैं ना ! ”
” अब हिन्दी कौन पढ़ता है ? ”
” बस अ आ इ ई तक ही सीख पाए फिर जरुरत ही नहीं पड़ी ! ”
” जनरल हिंदी में पास होने लायक आ जाएँ ”
” और कोई उपाय बताइए … जो खर्च लगेगा हम कर लेंगे !”
यहीं से मेरा दिमाग घूम जाता है !
[और मैं उनसे नम्रता से चले जाने को कह देता हूँ ! ]
मेरे कार्यालयीन नए सहयोगी उनहत्तर , उन्सठ, उनचास
में भ्रमित हों तो चल जाए किन्तु पेंतालिस की अंग्रेजी में
गिनती फार्टी फाइव भी उन्हें बताना पड़ती है !
तब अपने भारतीय
[ होते हुए जूता उतारकर ना मार पाने की मजबूरी के कारण ] होने पर सचमुच शर्म आती है !!!
[ मेरा तंत्र के विरुद्ध आक्रोश और अकेलापन
मुझे तीन तीन बार सड़कों पर ला चूका है !
किन्तु पछतावा नहीं है मुझे !
ईश्वर , समुन्दर की लहरों सा होंसला और ताकत बनाये रखे बस !]
मेरे आक्रोश पर भी आक्रोश आता है मुझे
क्योंकि जिनपर मेरा गुस्सा है,
क्या वे ही लोग जिम्मेदार हैं इस स्थिति के लिए ???
सोचता हूँ तो केवल 10 % दोष उनका पाता हूँ !
शेष 90 % तो वही तंत्र जिम्मेदार है !!!!!!!
इस तंत्र में केवल शासन ही नहीं वरन समाज
और हम सब समाज के ठेकेदार भी सम्मिलित हैं !
मेरे बच्चों के हिंदी मीडियम स्कूलों में पढ़ाए जाने पर
अक्सर अधिकांश लोग हमें या तो हेय समझते थे या दयनीय !
मेरे पिताजी के सामने विकल्प नहीं था इसीलिये उन्हें अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा लेनी पडी !
किन्तु मेरे समय उन्होंने और फिर मेरे बच्चों के लिए मैंने हिंदी माध्यम विकल्प ही चुना !
इसी कारण मैं और मेरे बच्चे रट्टू तोते नहीं विचारवान बने और आज अपने अपने क्षेत्र में अग्रणी हैं !
हमें भी अंग्रेजी आती है !
अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने के कारण हम अंग्रेजी की शिक्षा का महत्त्व समझते हैं !
किसी भी अन्य भाषा की तरह अंग्रेजी का भी सम्मान करते हैं !
किन्तु अपनी मातृभाषा के स्थान पर किसी अन्य भाषा को वरीयता के सम्बन्ध में
हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक परसाई जी की इन पंक्तियों का समर्थन -
” जो मनुष्य (स्वार्थवश) अपनी माँ को निर्धन , निरुपाय और करुण दशा में छोड़कर दुसरे की माँ की सेवा में रत हो उस अधम की कृतघ्नता का क्या कहना ! ”
यह पंक्तियाँ हाई स्कूल में 1977 में कक्षा में अध्ययन के दौरान पढ़ी / सुनीं थीं
किन्तु आज भी मेरे कानों और मन में जीवंत हैं !
हिंदी की इस दशा के लिए हम सभी दोषी हैं !
अक्सर उच्च पद प्राप्ति हेतु हिंदी से अलगाव और अंग्रेजी से जुड़ाव को आधार मान लिया जाता है !
किन्तु किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से बड़ा कोई पद होता है क्या ?
जर्मनी , जापान, रूस , चीन आदि के अधिकतर राष्ट्राध्यक्ष बिना अंग्रेजी माध्यम में पढ़े ,
बिना अंग्रेजी सीखे बनते हैं !
हमारे बड़े विरोधी पाकिस्तान की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में सम्मिलित
कई खिलाडियों ( जिनपर हम हँसते हैं ?) को भी बिना अंग्रेजी के सहारे के ही यह मुकाम मिला !
फिर हमारे यहाँ ऐसा क्यों नहीं हो पाता ?
क्योंकि परतंत्रता के दिनों में अंग्रेजों और अंग्रेजी जानने वालों को ही ‘ साहब ‘ माना जाता था !
शिक्षा केवल अंग्रेजी माध्यम में ही संभव थी !
हमने उसमे सुधार के कठिन मार्ग बनाने के स्थान पर सरलतम बने बनाए सहज मार्ग पर चलना स्वीकारा !
यह तब हुआ किन्तु आज भी हिन्दी के उपलब्ध जीर्णशीर्ण मार्ग के काया कल्प के स्थान पर
सरल सहज अंग्रेजी की चिकनी सड़क की ओर दौड़ जारी है !
कितने अकर्मण्य हो गए है हम लोग !
(अगले अंक में कुछ और महत्वपूर्ण कारण हिंदी के परित्यक्ता बनाये जाने के….. )

| NEXT



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sumandubey के द्वारा
November 11, 2011

चित्राशं जी नमस्कार, पहली बार आपका ब्लाग पढा और आपके हिन्दी प्रेम को जानकर बहुत खुशी हुई क्यो कि बहुतो के लिये यह पिछ्ड़ो की भाषा है चित्राशं जी विश्व मे शायद हम ही एऐसे देश है जिनकी राष्ट भाषा हिन्दी होते हुये भी अंग्रेजी को ही उच्च अदालतो मे उच्च परिक्षाओ मे यहां तक कि समाज मे भी आप हेय समझे जाते है आज भी देश मे कुछ परिक्षाए उच्च्स्तर पर है जहां प्रश्नाव्ली अंग्रेजी मे ही आती है आप खाली हिन्दी मे लिख सकते है इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि आप योग्यता रखते हुये भी हिन्दी मिडियम मे पढे होने के नाते या तो पहले इस स्तर की अंग्रेजी सीखिये या परीक्षा मत दें। मेरे ब्लाग पर भी आपका स्वागत है।

    Charchit Chittransh के द्वारा
    November 20, 2011

    सुमन जी ; बहुत बहुत धन्यवाद् ! स्पष्ट करना चाहूँगा कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है राजभाषा नहीं !!! हर शासकीय एवं अशासकीय कार्यालयीन क्रियाकलाप के लिए, नीतिगत नियमों के प्रसारण और उनकी व्याख्या के लिए आज आज़ादी के ६२ वर्ष बाद भी हिंदी मान्य ना होकर अंग्रेजी ही मान्य है ! कितने शर्म की बात है कि आज़ादी के तिरेसठवें वर्ष में किसी न्यायालय ने पहली बार हिंदी में निर्णय लिखने का कार्य किया !

alokranjan के द्वारा
October 25, 2011

बहुत सही कहा charchit भाई, दरअसल हमारी झूठी शान और बड़प्पन बहुत हद तक हिंदी की बर्बादी के लिए जिम्मेदार है. अगर ये सत्य है भाषाएँ माँ के समान होती हैं तो हिंदी हमारी सगी मां हुई.तो मेरा मानना है की सभी माताओं का सम्मान करो लेकिन कम से कम अपनी सगी मां को तो मत भूलो.

    Charchit Chittransh के द्वारा
    October 28, 2011

    मित्र; मान्यताओं के अनुसार ही मातृभाषा / मातृभूमि जैसे शब्दों का चलन है ! आपने सगी माँ का बहुत सटीक उदाहरण दिया है ! बहुत बहुत धन्यवाद् ! शुभ दीपावली ! देरी हेतु क्षमा !

Lahar के द्वारा
October 25, 2011

प्रिय चर्चित जी सप्रेम नमस्कार आपने बिलकुल सही कहा की हिंदी के दुर्दशा के लिए स्वम हम भारतीय जिमेदार है | आप की एक एक बात सही है | इतने महत्वपूर्ण आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई |

    Charchit Chittransh के द्वारा
    October 28, 2011

    मित्र; बहुत बहुत धन्यवाद् ! शुभ दीपावली ! देरी हेतु क्षमा !

Santosh Kumar के द्वारा
September 20, 2011

आदरणीय चित्रांश जी ,..सादर प्रणाम पता नहीं क्यों मैं आपके महत्वपूर्ण आलेख को पहले नहीं पढ़ सका ,..क्षमा चाहता हूँ .. आपकी बात बिलकुल सही है ,..जिनको हिंदी पढ़ना अच्छा लगता है उन सबको उपलब्ध नहीं है ,…कुछ पढ़ सकते हैं और उपलब्ध भी है तो उनके पास रूचि का अभाव है ,..समय ना होने का बहाना तो है ही ,..बाकी ..???… शिक्षा क्षेत्र में हिंदी लगातार पिछड़ रही है ,..यह हमारी सामजिक गुलामी वाली मानसिकता है ,..सच भी है जो शिक्षा रोटी दे वही उपयुक्त है ,..आप विद्वान् हैं ,.और सफल भी हैं ..लेकिन सामान्य शिक्षा वाले को अंग्रेजी ना आने की कीमत भी चुकानी पड़ती है ,…मैं एक वास्तविक उदहारण देता हूँ —… मेरे एक परिचित हैं ,..ग्रामीण हैं ,…अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए बहुत जोर डालते हैं ,..मैंने उनसे पुछा ..आप किसी और विषय पर बच्चों से कुछ क्यों नहीं कहते ,..जब देखो अंग्रेजी -अंग्रेजी ……. उनके जबाब ने मुझे सन्न कर दिया ……उन्होंने बताया कुछ साल पहले उनको अंग्रेजी ना आने की वजह से दो अच्छी नौकरियां छोड़नी पड़ी और उनका स्वप्न टूट गया ,…अतः अब कुंठा है,…. कहीं बच्चे भी ना पिछड़ जाएँ …मैंने उनको समझाया अब ऐसा नहीं है ,.सामान्य अंग्रेजी तो आनी ही चाहिए लेकिन हिंदी सबसे ज्यादा जरूरी है ,………..मेरे हिसाब से प्रतिभा किसी भाषा की मोहताज नहीं होती ,..लेकिन हर किसी के पास प्रतिभा भी नहीं होती ,…हिंदी को रोजगार से जोड़ना होगा ,….तभी कुछ …बाबा रामदेव ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के सशक्तिकरण की बात की है ,…मैं उनका पूरा समर्थन करता हूँ ,……सादर आभार ,..अगली पोस्ट की प्रतीक्षा होगी

    Charchit Chittransh के द्वारा
    September 21, 2011

    मित्र ; बहुत बहुत धन्यवाद् ! मैं भी समर्थन करना चाहूँगा कि हिंदी केवल हिंदी के प्रेम मात्र से विकसित नहीं हो सकती ! आवश्यकता है हिंदी को राजकीय क्रियाकलाप कि भाषा बनाने की , और भारत को भारतवासियों का देश बनाने की ! अभी तो भारतवासी कुछ नहीं हो सकता कहते हुए सामान्यतः किसी और देश का ही वासी होता है ! जय हिंद !


topic of the week



latest from jagran