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हमारा राष्ट्रगान कितना न्यारा ???-2

Posted On: 12 May, 2011 में

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दोस्तो ; जय हिंद !
श्रद्धेय कवीन्द्र गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगौर जी का उत्कृष्ट जीवन परिचय प्रस्तुत करने पर ओ पी पारीक जी को वधाई एवं आभार !
गुरुदेव के कुछ प्रेरक प्रसंग मुझे भी महान दार्शनिक एवं अनुसरण योग्य ज्ञात हैं !
किन्तु आज भूलवश उनकी १५०वी जयन्ती समारोह का ध्यान नहीं रह पाया और अनजाने में आज टाले जाने योग्य राष्ट्रगान का प्रसंग बेमौके प्रतिक्रिया पर पुनर्प्रतिक्रिया रुपी ब्लॉग के रूप में उठा दिया !
समस्त साहित्य जगत के अनुरागियों से क्षमा प्रार्थना सहित !
स्वर्गीय गुरुदेव को श्रद्धांजलि के साथ ही उक्त ब्लॉग एक सताह के लिए हटा रहा हूँ !

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 14, 2011

आदरणीय चित्रांश जी …सादर प्रणाम ! मैं और कुछ नहीं जानता मैं तो यहाँ पर आपको नमन करने आया हूँ ….. आभार सहित

surendrashuklabhramar5 के द्वारा
May 13, 2011

प्रिय चर्चित चित्रांश जी -कहीं प्रतिक्रिया में भी आप की मैंने पढ़ा था और लिखा भी था कृपया निम्न पर ध्यान दें गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म दिन था 9.5.1861( 9 May) और पुण्य तिथि थी 7.8.1941 ( 7 August) वे एक विद्वान , विचारक , महान कवि और लेखक थे -आज भी शांति निकेतन जा अजीब सुकून मिलता है उन्होंने हमारे देश के गौरव को विदेशों तक पहुँचाया शुक्ल भ्रमर ५

    Charchit Chittransh के द्वारा
    May 14, 2011

    जी शुक्लजी ; धन्यवाद् ! हर लेखक उत्तम विचारक स्वतः ही होता है ! वे तो बहुमुखी प्रतिभासंपन्न प्रेरणापुंज थे ! उनका [ मेरे लिए ] एक प्रेरक प्रसंग पढ़ने मिला जो ठीक तरह समझा नहीं जाने के कारण उद्धृत नहीं किया था इस प्रकार है – ७० वर्षीय गुरुदेव रोज सुबह ११ बजे के पहले अपने कमरे की खिड़की पर पंहुच बाहर सड़क पर एक १२ वर्षीय लडकी को स्कूल जाते हुए देखने प्रतीक्षा किया करते थे ! उनके एक मित्र ने भांपा और पूछा \’\'क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी / पोती दिखती है उसमें जो इतना व्याकुल रहते हो उसके लिए ? \" गुरुदेव ने कहा – \’\’ नहीं ! वह अतिसुन्दर है… मुझे सौन्दर्य देखना अच्छा लगता है बस …. इसीलिये \" \’\’ किन्तु किस रिश्ते की भावना से ? तुम्हारी पोती जितनी है वह … \" \’\’ माँ जितनी सुन्दर है वह …… सौन्दर्य के प्रति श्रद्धा के भाव से ! उन्होंने चंद फीट दूर से गुजरती उस बच्ची को ना कभी आवाज दी ! ना बुलाकर बात की किन्तु जिस दिन उसके स्कूल की छुट्टी होती गुरुदेव को अपूर्णता लगती ! [ मेरा भी यही मानना है कि प्रत्येक रिश्ता श्रद्धा घटाता है !] \’\’

    surendrashuklabhramar5 के द्वारा
    May 14, 2011

    ठीक कहा आपने चर्चित जी इस उद्धरण को मैंने भी पहले कहीं पढ़ा था आज आप ने याद को तारो ताजा कर दिया ऐसा ही होता है जिस तरह भावना -मन होता है उस तरह की आँखें -उसी तरह हम देखते हैं सुनते है और करते हैं हर लेखक उत्तम विचारक स्वतः ही होता है ! हर व्यक्ति अपने आप में एक अद्भुत रचना स्वतः है जिसका को जोड़ तोड़ नहीं —


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