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जागो मृतप्राय ... जागॊ--ऒ---ऒ !!! प्रगति का आधार - ईमानदार विचार!

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क्या हक़ नहीं है मुझे उपदेश देने का ???

Posted On: 2 Mar, 2011 में

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{ कुछ पाठक मेरे लेखों को पढ़ते हुए
मेरे सुझावों/ संदेशों को अव्यवहारिक मान सकते हैं ..
इसीलिये यह अग्रिम स्पष्टीकरण देना अपना कर्त्तव्य समझ प्रस्तुत कर रहा हूँ } -
निवेदन -
“उपदेशक के व्यक्तित्व से अधिक सन्देश की उपयोगिता को महत्त्व देना चाहिए ”
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
पर उपदेश कुशल बहुतेरे …
हममें से अधिकांश
किसी उपदेश की प्रतिक्रिया में
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित
उक्त पंक्तियाँ दोहरकर
उपदेशक पर अव्यावहारिक होने का दोष मढ़ने में ही
अपना भला समझते हैं .
मजेदार बात यह है कि
आधी चौपाई ही प्रचलित है
अधिकाँश को तो पूरी चौपाई याद आ ही नहीं पाती
पूरी चौपाई है
“पर उपदेश कुशल बहुतेरे जे आचरहिं ते नर ना घनेरे ”
और भी मजे की बात
पूरी चौपाई मालूम भी हो जाए तो
यही सन्देश समझा जाता है कि
खुद अपने उपदेशों पर आचरण करने वाले बहुत कम होते हैं.
ऐसा होना ठीक ही है
इसीलिए उपदेश देना तो ठीक है किन्तु उनका अनुपालन करना अनावश्यक !
हम आम हैं , खास नहीं !
और हमें खास होने की जरुरत भी क्या है ?
आप अपने आदर्शों का पालन करने स्वतंत्र हैं किन्तु
मैं ऐसा नहीं कर पाता !
मेरे किसी भी ब्लॉग पर कहीं भी लिखा गया कोई भी व्यक्तिगत या सामाजिक सुझाव
ऐसा नहीं है जिसका अनुपालन मैं स्वयं नहीं करता !
कारण मेरे कुल के आदर्शवादी संस्कार होंगे शायद !
निश्चय ही आसान नहीं होता कि
जिन आदर्शों का हम समर्थन करें
उन्हें अपनाएँ भी
किन्तु
सरल तो कुछ भी नहीं
जो जितना कठिन कार्य होगा
उसका प्रतिफल भी उतना ही सुखकर होगा !
मेरी जीवनचर्या के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ .
इस उद्देश्य के साथ कि मेरे जैसा “आम आदमी” भी ऐसा है .
हर कोई हो सकता है !
मैं मेरे देश से प्रेम करता हूँ इसीलिये

क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता का खुलकर विरोध करता हूँ !

.

{मेरे लिए भारत देश मेरा बहुत बड़ा मकान है जिसमें
मेरा निवास भी है, कार्यालय भी, बगिया भी ,खेती – बाड़ी भी
कर्नाटक , आन्ध्र और महाराष्ट्र मुख्यद्वार से लगे कार्यालय एवं बैठक हैं ,
दक्षिणी प्रदेश लान, बाग़, बगीचे हैं ,
पूर्वोत्तर पिछवाड़े का कछवारा है,
पंजाब, हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड आदि मेहमानखाने { गेस्टरूम }
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान , बिहार आदि प्रदेश
शयन कक्ष ,भोजन कक्ष ,रसोई आदि जरुरी हिस्से हैं .}
.

{जितने उपलब्ध हो सके विभिन्न धर्म के ग्रंथों को पढ़ने / समझने का प्रयास किया
किसी भी भारतीय {हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई , बौद्ध, जैन आदि } धर्म में
एक भी असंगत बात नहीं मिली सभी में उचित आदर्शों के पालन के सन्देश मात्र
किसी धर्मं में एक भी शब्द मानवता विरोधी नहीं मिला .}
.
इसीलिये सभी धर्मों का सामान रूप से आदर करता हूँ
.

मेरा परिवार

.
- जातपात पूछकर किसी से किसी तरह का व्यवहार नहीं करता !
- ना ही जाति के आधार पर व्यवहार परिवर्तन !
- दीपावली पर दीपमालिका तो सजाता है मगर
. पटाखों पर खर्च करने के स्थान पर अनाथालयों , वृद्धाश्रमों में सामर्थ्यानुसार फल आदि पंहुचाता है !
- भिखारी को नकद भीख ना देकर भोजन सामग्री ही देता है !
- किसी भी धार्मिक समारोह {गणेशोत्सव , दुर्गोत्सव जैसे } में चंदा नहीं देता किन्तु
श्रद्धानुसार / सामर्थ्यानुसार पूजन /हवन /प्रसाद सामग्री का योगदान करता है !
- होलिकोत्सव पर छोटे बेटे के अतिरिक्त कोई भी रासायनिक रंगों का प्रयोग नहीं करता !
{इस वर्ष से छोटा बेटा भी ऐसा ही करने को तत्पर है }
- रेलवे स्टेशन आदि सार्वजानिक जगहों पर कचरा पेटी थोड़ी दूर पर भी हो तो भी प्रयोग करने पूरा प्रयत्न करता है !
- देवी देवताओं की तस्वीरों सहित पैकिंग वाले उत्पाद ,अगरबत्ती/ धूपबत्ती आदि पूजन सामग्री भी, खरीदने से बचता है !
- आर्थिक असमर्थता के वर्ष छोड़कर प्रतिवर्ष किसी योग्य निर्धन छात्र /छात्रा को शिक्षा सामग्री, फीस आदि की सहायता करता है !
- परनिंदा रस परिचर्चा में योगदान नहीं करता !
-अपनों की प्रगति में अपनी प्रगति सी प्रसन्न होता है !

-विरोधियों की प्रगति से आहत नहीं !
- केवल कार्यों का विरोध करता है व्यक्तियों का नहीं !
- का कोई दुश्मन नहीं !
- किसी अन्य के ज्ञात गुप्त प्रकरणों / शर्मिंदगी के कारकों का प्रचार प्रसार नहीं करता !
- पानी के दुरूपयोग को निरुत्साहित करने प्रयासरत रहता है !
- बेटा – बेटी – बहु की समानता का समर्थक है !
{मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर बेटी नहीं जन्मीं तब किसी अनाथ को गोद लेने का २० वर्षों तक असफल प्रयास किया
अनाथालयों ने या तो एक संतान के होते हुए दूसरी को गोद ना दे पाने की कानूनी मजबूरी कह टाल दिया या
बड़ी राशी के योगदान की शर्त रखी. मैं दोनों तरह से अयोग्य था. अब बच्ची की जिम्मेदारियां पूरी कर सकने योग्य
उम्र शेष नहीं लगती . इसीलिये इस कमी के साथ रहने की आदत डाल ली है .
हाँ बेटे और [ होने वाली ] विजातीय बहु दोनों हमारे लिए एक समान माननीय हैं }
.

कैसे किया ? क्या खोया ? क्या पाया ?

.

एक दिन में नहीं हुआ सबकुछ .
मैं शुरुआत से ऐसा ही नहीं हूँ
मैंने भी अपरिपक्वता की आयु में पिताजी से असहमति जताई है .
मैं भी पिताजी के आदर्शवादिता वश आर्थिक अभावों से आक्रोशित रहा हूँ
किन्तु समय के साथ साथ पुस्तकों और परिचर्चाओं से परिपक्वता बढ़ती जा रही है,
और ईमानदारी से परिपूर्ण आदर्शों भरा जीवन जीने का वास्तविक सुख उठाकर
मेरे साथ साथ मेरी पत्नी, [होने वाली ] बहु और बेटे भी गौरवान्वित हैं !
मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे आदर्शों के पालन में
मेरी पत्नी और बेटों के साथ साथ भावी बहु का भी सहयोग प्राप्त है .
पत्नी वैवाहिक जीवन कि प्रत्येक वर्षगाँठ के साथ साथ और अधिक अनुसारी होते होते
२३ वे वैवाहिक वर्ष तक आदर्शवादिता में मुझसे आगे निकल चुकी हैं .
यही हाल बेटों का है .
जैसे मैंने मेरे पिताजी के सिद्धांतों को पाला
मेरे बेटे मुझसे अधिक अच्छी तरह
मुझसे अपेक्षाकृत बहुत कम आयु में
उन्हीं आदर्शों को प्रसारित कर रहे हैं .

क्या खोया ? क्या पाया ?

-मेरे स्कूल में दाखिले के समय मैं बहुत शर्मीला था
जैसे तैसे पहली कक्षा में दाखिला हुआ
छोटे से गाँव के छोटे से सरकारी प्राइमरी स्कूल में .
वहां के हेड मास्टर भी सिद्धांतवादी ही थे
साल भर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद
परीक्षा में जाने क्या हुआ था मुझे
मास्साब के बार बार कहने पर भी कि “कहानी सुनाओ नहीं तो फेल हो जाओगे ”
मैंने कहानी नहीं सुनाई तो नहीं सुनाई ,
और मैं फेल हो गया
पिताजी के साथियों ने बहुत कहा
“बड़े बाबू आप जाकर मिल लो, मास्साब आपकी बात रखेंगे, बच्चे का साल बच जाएगा ”
मगर पिताजी को पढ़ाई में पक्षपात पूर्ण परिणाम पसंद नहीं था
अगले ही वर्ष से मुझे स्वयं भी घर पर पढ़ाई में मदद करने लगे
और तब से ही हर साल हर कक्षा में मेरा परीक्षा परिणाम सर्वप्रथम रहने लगा था .
मैंने एक साल खोया था किन्तु जो पाया वह तो वर्णनातीत है …
- मेरे विवाह के बाद पत्नी से पहले संवाद में
पत्नी ने पूछा “मुझसे कितना प्यार करते हो ?”
मेरा उत्तर था “हम आज पहली बार मिल रहे हैं… अभी तो एक दुसरे को ठीक तरह देखा भी नहीं…
अभी तो प्यार का जन्मना भी शेष है ”
उन्हें अच्छा नहीं लगा  “क्या यह काफी नहीं कि हम पतिपत्नी हैं ? ”
मैंने समझाने का प्रयास किया “हम पति पत्नी हैं यह हमारा रिश्ता है
किन्तु किसी भी रिश्ते में प्यार का पल्लवन एक दूसरे के प्रति किये जाने वाले व्यवहार से होता है ,
आप मेरी पत्नी हैं जिस तरह में आपसे और आप मुझसे व्यवहार करेंगी उसी तरह प्रेम बढ़ेगा ”
उन्हें इस बात पर मुझसे सहमत होने में २० वर्ष लग गए किन्तु
आज हम दोनों मिलकर ही पूर्ण हैं , एक दूसरे के बिना, दोनों ही आधे हैं .
वो एक विदुषी महिला हैं किन्तु मेरी और उनकी विचारधारा ठीक विपरीत थी
दोनों ही अपूर्ण , दोनों ही दोष सहित किन्तु
दोनों के विचारों के मेल से एक नयी विचारधारा का जन्म हुआ

और आज दोनों मिलकर एक सशक्त दंपत्ति !
-जब जिसके लिए जो कर सकते थे
हम करते रहे
परिणामतः हमारे नाम किसी बैंक में कोई फिक्स डिपाजिट नहीं ,
कोई और नगद निवेश भी नहीं !
किन्तु रास्ता चलते ,दैनिक जीवन में हर किसी अपने के पास अपनेपन की अनेकों फिक्स डिपाजिट हैं
इनका पता तब चला जब विगत २ वर्ष अस्वस्थता वश अवैतनिक अवकाश पर रहा !
मैं मेरे माता पिता का एकमात्र पुत्र और ३ बहनों का अकेला भाई ‘ था ‘
किन्तु आज मेरे कम से कम ५० ‘सगे भाई’ तो होंगे ही !
इतनी ही बहनें और बेटियां भी !
भले मैं धन संपन्न नहीं ,
सुखी-समृद्ध अवश्य हूँ !
मुझ सी समृद्धि धन से नहीं मिलती !
धन के बिषय में
“साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ , साधू ना भूखा जाय ”
का समर्थक हूँ मैं !
यानी प्रभु इतना अवश्य दे देते हैं जिसमें
कुटुंब की आज के समय की आवश्यकताओं की पूर्ती हो जाती है.
और कितना चाहिए ?
क्योंकि
” पूत सपूत तो क्यों धन संचय
पूत कपूत तो क्यों धन संचय ”
भी प्रासंगिक है .
मैं और मेरे परिजन
स्वयं को समृद्ध ही मानते हैं !
जिस तरह मैं स्वयं सुखी हो पाया हूँ ,
जिस मार्ग पर चलकर हो पाया हूँ
केवल वही अनुभूत उपदेश / सलाहें / सन्देश
मेरे लेखों के माध्यम से देने संकल्पित हूँ !
जिन्हें भी अन्यथा प्रतीत हो उनके लिए यह लेख लिखा है
फिर भी प्रश्न शेष हों तो प्रतिक्रिया खंड में स्वागत है .
मेरा स्पष्टीकरण या क्षमा याचना अवश्य वहां मिलेगी !

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shiromanisampoorna के द्वारा
March 3, 2011

आपका जीवन अनुकरणीय और पेरणादायीहै आपकोनमन

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    शिरोमणि जी , बहुत बहुत धन्यवाद् ! मुझे नहीं हर उस आम आदमी को नमन जो विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और ईमानदारी का साथ साहस पूर्वक निभाने में सफल रहा है .

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 3, 2011

स्नेही चित्रांश जी, आपने अपनी ज़िंदगी के जिस फलसफ़े का ज़िक्र यहाँ किया है वह उच्च आदर्श समेटे हुए हैं जिसका कुछ हद तक मुझ पर भी प्रभाव है..आज भी हमारे देश में नागरिक तो हैं पर उनमें सिविक सेन्स की अत्यधिक कमी है| अगर हम बदलाव चाहते हैं तो उसकी शुरुआत अपने आसपास से अपनेआप से ही करनी होगी| आभार सहित आपका अनुज,

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    वाहिद जी , जय हिंद ! धन्यवाद् ! खुद अपने आपसे सुधारों की शुरुआत करने भर की देर होती है फिर जीवन पथ के सारे कांटे एक एक कर फूल बनते जाते हैं . आपने भी यह सुख जिया है . वधाई !

vinita shukla के द्वारा
March 3, 2011

आपने अपनी इस रचना में एक अलग सोच और जीवन दर्शन से रूबरू कराया. पढ़कर अच्छा लगा.

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    रचना जी , बहुत बहुत धन्यवाद् ! जो भी मैंने इस लेख में लिखा है पूरी तरह यथार्थ है !

rachna varma के द्वारा
March 3, 2011

वाजपेयी जी सादर नमस्कार , आप जिस मुकाम पर है वहाँ से आप आदेश ,सन्देश और सन्देश सभी कुछ दे सकते है आप जैसे अनुभवी और सदा जीवन जीने वाली लोगो की आज सभी को जरुरत है | अपने जीवन का बेबाकी से परिचय देने के लिए आभार आपका !

    rachna varma के द्वारा
    March 3, 2011

    कृपया आदेश ,उपदेश और सदेश पढ़िए |

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    रचना जी, जय हिंद ! प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद् ! मेरे किसी भी सन्देश का उद्देश्य केवल यह है कि जब मैं कर सकता हूँ तो कोई भी कर सकता है . क्योंकि मैं एक बहुत ही साधारण व्यक्ति हूँ , भारत के बहुसंख्य आम नागरिकों में से एक इसीलिये इस वर्ग कि सीमितताओं से परिचित भी , किन्तु आत्मा की आवाज मुझे हर असत से दूर रहने विवश करती रहती है .

rahulpriyadarshi के द्वारा
March 3, 2011

आपकी जिंदगी का फलसफा बहुत ही ज्यादा प्रभावित करता है,सुखी और संतोषप्रद जिंदगी जीने की कला से अवगत करता आपका यह लेख वन्दनीय है.इन बातों को आत्मसात कर कोई भी धन्य महसूस करेगा. मैं आपके विचारो एवं आपके व्यक्तित्व की प्रशंसा करता हूँ.

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    राहुल जी , जय हिंद ! प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत धन्यवाद् ! यह सब यहाँ लिखने का उद्देश्य ही यह बताना है कि ईमानदारी की रोजी से कमाई रोटी सब से अधिक स्वादिष्ट , स्वास्थ्यकर और सुखकर है !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 5, 2011

    बिलकुल इमानदारी से जीविकोपार्जन ही स्वाभिमानी जीवन की नीव होती है,मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ.

chaatak के द्वारा
March 3, 2011

चित्रांश जी, आपकी जीवनचर्या पढ़कर बड़ा अच्छा लगा और एक ही बात सर्वप्रधान महसूस हुई कि आपके पास एक ही चीज़ विशिष्ट है और आप उसे आने वाली पीढ़ियों में निरंतर कर रहे हैं वह हैं वे संस्कार जो आपको अपने शिक्षक और पिताजी से मिले| जिस तरह आपने स्वीकार किया कि पहले आपकी पिताजी से असहमति थी लेकिन फिर अपने पाया कि उनके विचार ही उत्तम थे| इसी जगह पर हमारी युवा पीढ़ी भटक रही है वह समझती है कि माता-पिता दकियानूसी हैं और वे स्वयं सही हैं| आज का युवा अपने आप को अपरिपक्व मानने को तैयार ही नहीं| आशा है आपकी इस पोस्ट को पढ़कर सभी युवा और किशोर इसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करेंगे| आभार !

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    चातक जी , जय हिंद ! प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत धन्यवाद् ! जी आपने बिलकुल ठीक कहा की मैं भी कुछ समय के लिए अपने संस्कारों से दूरी बना बैठा था और मेरे लेख का आशय भी यही है कि भीड़ मेरे जैसा कोई भी भीड़ में शामिल व्यक्ति आम से आदर्श में बदल सकता है बस इच्छा होनी चाहिए .

nishamittal के द्वारा
March 3, 2011

चर्चित जी,आपके विषय में इतना सब जानकार आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ,जीवन सभी जीते हैं परन्तु कथनी व करनी में अंतर के साथ. ईश्वर करे आपकी और आपके परिवार की सदप्रवृत्ति यूँ ही बनी रहे और सदा सबको प्रेरणा प्रदान करते रहें.हार्दिक्ल शुभकामनाओं के साथ.

    nishamittal के द्वारा
    March 3, 2011

    कृपया हार्दिक पढ़ें.

    charchit chittransh के द्वारा
    March 4, 2011

    निशा जी , बहुत बहुत धन्यवाद् !

Amit Dehati के द्वारा
March 2, 2011

आदरणीय चर्चित जी , चुकी आपके पोस्ट को पढने में थोडा समय खर्च हुआ है परिणाम स्वरुप मेरा कर्तव्य है की अपना अनुभव प्रस्तुत करूँ …… वैसे जो भी आपने लिखा है अमल करने लायक है ….. आप स्वाभिमानी व्यक्तिव का अनुभव लिए जिंदगी को सुकून से जीने की अविस्वस्नीय प्रयास किये और अभी तक आप सफल है …….आपके पोस्ट को पढ़ कर ऐसा नहीं लगा की मैंने अपना समय नुकसान किया …हर शब्द में वास्तविकता झलक रही थी …. और इस सिधांत का मैं भी समर्थन करता हूँ ….. “साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय मैं भी भूखा ना रहूँ , साधू ना भूखा जाय ” धन्यवाद ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    charchit chittransh के द्वारा
    March 2, 2011

    अमित जी , सार्थक प्रतिक्रिया पाकर ही लगता है लिखना सार्थक हुआ.बहुत बहुत धन्यवाद् !

    rajkamal के द्वारा
    March 2, 2011

    चित्रांश जी …. नमस्कार ! इस लेख को अच्छा कर कर अपना पल्लू नहीं झाड़ा जा सकता है …… वाकई में यह लेख कबीले तारीफ है …… बस शुक्र है तो इसी बात का कि आपकी पत्नी ने आपको समझने के लिए चाहे इतना ज्यादा समय लिया , कम से कम समझा तो सही ….. अमित भाई के विचार मेरे भी है …… धन्यवाद

    charchit chittransh के द्वारा
    March 2, 2011

    भाई राजकमल जी , बहुत बहुत धन्यवाद् !


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