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नादाँ थे हम......

Posted On: 22 Feb, 2011 में

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……..नादाँ थे हम………

.

कुछ अजीबोग़रीब सी जिंदगी जी हमने !

पत्थरों से भी उम्मीद-ए-वफ़ा की हमने !

.

वो जिन्हें शऊर नहीं आदाब-ए-महफ़िल का,

दाबत-ए-बज़्म उन नामाकूलों को ही दी हमने !

.

सूखे दरख्तों के फिर पत्ते हरे नहीं होते,

आरज़ू -ए-गुल बेवजह ही की हमने !

.

वतन परस्ती से नहीं दूर तक नाता जिनका,

कमान-ए-वतन उन्हें खुद ही थी दी हमने !

.

फिरकापरस्ती है शौक-ओ-शगल जिनका,

दरख्वास्त-ए-अमन खुद उनसे ही थी की हमने !

.

क़ाबिज किये हर साख पे उल्लू खुद उनने,

निगरानी-ए-चमन जिन्हें कभी थी दी हमने !

.

अब हक-ए-फ़रियाद से भी शर्मिन्दा उनसे,

गफलत में  हुक्मरानी जिन्हें खुद सौंप दी हमने !

……………………………………


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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

priyasingh के द्वारा
February 22, 2011

उर्दू और शाएरी में मेरा दखल थोडा कम है …………. पर आपने तो लाज़वाब पंक्तिया रची है ……….

    charchit chittransh के द्वारा
    February 22, 2011

    प्रियाजी , बहुत बहुत धन्यवाद् ! मेरी कमी रह गई कठिन उर्दू शब्दों के अनुवाद Excerpts में डालने थे .

rajkamal के द्वारा
February 22, 2011

प्रिय चित्रांश जी …नमस्कार ! ऐसा लग रहा है की यह कविता आज के ताजा माहौल पर लिखी गई है ….. बहुत ही सुंदर रचना बधाईयाँ

    charchit chittransh के द्वारा
    February 22, 2011

    बहुत बहुत धन्यवाद् , राजकमल जी ! आप कभी चूकते नहीं , आशीर्वाद बनाए रखिये !

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 22, 2011

श्री चित्रांस जी, बहुत ही खूबसूरत लाइन प्रस्तुत की आपने……. आकाश तिवारी

    charchit chittransh के द्वारा
    February 22, 2011

    बहुत बहुत धन्यवाद् ,तिवारी जी !


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