स्व सा सन्

जागो मृतप्राय ... जागॊ--ऒ---ऒ !!! प्रगति का आधार - ईमानदार विचार!

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Charchit Chittransh


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चुनाव 2012 के मतदाताओं से …

Posted On: 19 Jan, 2012  
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कौन नहीं है भ्रष्ट ???

Posted On: 10 Jan, 2011  
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नादाँ थे हम……

Posted On: 22 Feb, 2011  
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सुख के साधन

Posted On: 25 Feb, 2011  
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Others मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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क्या हक़ नहीं है मुझे उपदेश देने का ???

Posted On: 2 Mar, 2011  
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हमारा राष्ट्रगान कितना न्यारा ???-2

Posted On: 12 May, 2011  
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अन्नाजी ;जय हिंद !!!

Posted On: 22 Jun, 2011  
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“हमारा राज देश पर तो देश का दुनियां पर”-1

Posted On: 22 Jun, 2011  
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अन्ना जी पर ‘ जाज ‘ के सवालों का जबाब !

Posted On: 21 Aug, 2011  
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पूजूं कैसे राम को ? पूजता हूँ रावण को ….

Posted On: 10 Sep, 2011  
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‘लिव इन ‘ ना बदलाव ना भटकाव्’ – jagran junction forum

Posted On: 6 Oct, 2011  
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प्रियतम अब तो आ जाओ

Posted On: 28 Feb, 2014  
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चर्चित प्रेम दर्शन

Posted On: 4 Feb, 2014  
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“वास्तविक आज़ादी की ओर …”(कान्टेस्ट)

Posted On: 29 Jan, 2014  
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Contest social issues में

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कविता- मेरी सुहागरात…(कान्टेस्ट)

Posted On: 20 Jan, 2014  
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Contest कविता में

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वफ़ा पत्थर से भी …..

Posted On: 6 Jan, 2013  
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पीड़िता के बयान !

Posted On: 30 Dec, 2012  
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वो बेनाम सर्व शक्तिमान !-1

Posted On: 20 Nov, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मित्र; मंच पर चर्चित ब्लॉग लेखक वे हैं जो किसी वर्ग विशेष के विरोध में या ऐतिहासिक तथ्यों पर या एक पक्षीय आलोचक हैं ! यहाँ ' जय हिंद ' शब्द के उपयोगकर्ता को कांग्रेसी, वन्दे मातरम् वाले को संघी, भ्रष्टाचार विरोधी को अन्ना ग्रुप का, इस्लाम / ईसाइयत के किसी गुण के उल्लेखकर्ता को ( "त्याज्य " ) उदारवादी समझा जाता है ! मेरे मत में कुछ भी पूर्ण अंगीकार योग्य उत्तम नहीं हो सकता ना ही पूर्ण गुणहीन त्याज्य ! इसी तरह मौन भी पूर्ण सन्देश की अभिव्यक्ति में समर्थ है और आजीवन धाराप्रवाह उद्वोधन भी अपूर्ण ! फिर जिस विषय पर लिखने का प्रयास है वह इतने कम शब्दों में अपनी उद्देश्य पूर्ती में अक्षम है तो कुछ भी अनहोना नहीं ! आपकी जिज्ञासा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से बताना चाहूँगा की मेरा पंथ मानवता वादिता एवं यथार्थ वादिता !

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

चित्राशं जी नमस्कार, पहली बार आपका ब्लाग पढा और आपके हिन्दी प्रेम को जानकर बहुत खुशी हुई क्यो कि बहुतो के लिये यह पिछ्ड़ो की भाषा है चित्राशं जी विश्व मे शायद हम ही एऐसे देश है जिनकी राष्ट भाषा हिन्दी होते हुये भी अंग्रेजी को ही उच्च अदालतो मे उच्च परिक्षाओ मे यहां तक कि समाज मे भी आप हेय समझे जाते है आज भी देश मे कुछ परिक्षाए उच्च्स्तर पर है जहां प्रश्नाव्ली अंग्रेजी मे ही आती है आप खाली हिन्दी मे लिख सकते है इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि आप योग्यता रखते हुये भी हिन्दी मिडियम मे पढे होने के नाते या तो पहले इस स्तर की अंग्रेजी सीखिये या परीक्षा मत दें। मेरे ब्लाग पर भी आपका स्वागत है।

के द्वारा: sumandubey sumandubey

http://swasasan.jagranjunction.com/?p=468 पूज्यनीय चित्रांश जी .....सादर प्रणाम ! इस समाजिक बुराई के खिलाफ सरकार तो सक्रिय है लेकिन हमारा समाजिक ताना बाना ही उलझा हुआ है ..... शिक्षा का बढ़ता हुआ प्रतिशत भी शायद लोगों की पिछड़ी हुई सोच में सकारात्मक बदलाव शायद ही उस स्तर तक ले आये जितना की होना चाहिए ..... भला तो ऐसे कुक्र्त्य करने वाले और इसका शिकार होने वाले दोनों का ही नहीं हो पाता है ..... आपके इस लेख की जितनी भी तारीफ की जाए वोह कम ही होगी -इन पर अमल किया जाए तो ही हमारे समाज को खुशहाल और सुखी बनाने में हम अपना बनता योगदान दे सकेंगे .... मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/05/“भ्राता-राजकमल-की-शादी”/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

मित्र; जहाँ तक मुझे याद है , आपके लेख पर मेरी पहली टिपण्णी बहुत तल्खी में की गई थी ! जिसमें मेरी भाषा ' असंसदीय ' हो गई थी , इसीलिये मैंने क्षमाप्रार्थना की थी ! तब से हमारे बीच निरंतर विचारों का आदान प्रदान जारी है ! किन्तु आप क्षमा मांग कर मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं ! आपने सर्वथा उपयुक्त विचार व्यक्त किये हैं ! ( आज का ) मैं भी किसी व्यक्ति को अधिकतम २४ घंटे में पूरी तरह समझ सकता हूँ ! किन्तु ना तो मैं सदैव से इतना सक्षम हूँ , ना जनसामान्य में अन्य लोग ! इसीलिये हरेक की परखने की अलग अलग समयसीमा होगी ही ! मैं आपके ५-७ दिन की या ऐसी ही कोई समय सीमा से पूरी तरह सहमत हूँ ! आपके प्रोत्साहन का बहुत बहुत धन्यवाद् !

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

आदरणीय चित्रांश जी ,.सादर प्रणाम जैसा की मैंने पहले ही कहा मेरी योग्यता नहीं है कुछ कहने की ,..आपकी सबसे महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगी ...."भविष्य में जुड़ने की आकांक्षा सहित , यौन संपर्क रहित स्वस्थ सहवास तो स्वागत योग्य !".... मुझे नहीं लगता है कि उन्मुक्तता के माहौल में यह संभव है ....फिर जब भविष्य में जुड़ना ही है तो परिवार के साथ कुछ समय बिताना गलत नहीं कहा जा सकता है ,..लेकिन कितना समय ,.५-७ दिन बहुत होंगे ,...या तो बात बन जाएगी ,..या फिर जय राम जी की.. मेरा मानना है ,..जो लोग महीनों सालों इस्तेमाल करने के बाद विश्वास करना चाहते हैं वो ना सिर्फ खुद के साथ बल्कि अपने परिवार की भावनाओं के साथ खिलवाड़ ही कर रहे हैं ,... प्रत्येक बारीक़ पहलू पर प्रकाश डालते आपके आलेख बहुत सराहनीय हैं,..आपका हार्दिक आभार यदि मेरी बात उचित ना लगे तो मूरख समझ क्षमा कर दीजियेगा ,..पुनः आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदरणीय चित्रांश जी ,..सादर प्रणाम पता नहीं क्यों मैं आपके महत्वपूर्ण आलेख को पहले नहीं पढ़ सका ,..क्षमा चाहता हूँ .. आपकी बात बिलकुल सही है ,..जिनको हिंदी पढ़ना अच्छा लगता है उन सबको उपलब्ध नहीं है ,...कुछ पढ़ सकते हैं और उपलब्ध भी है तो उनके पास रूचि का अभाव है ,..समय ना होने का बहाना तो है ही ,..बाकी ..???... शिक्षा क्षेत्र में हिंदी लगातार पिछड़ रही है ,..यह हमारी सामजिक गुलामी वाली मानसिकता है ,..सच भी है जो शिक्षा रोटी दे वही उपयुक्त है ,..आप विद्वान् हैं ,.और सफल भी हैं ..लेकिन सामान्य शिक्षा वाले को अंग्रेजी ना आने की कीमत भी चुकानी पड़ती है ,...मैं एक वास्तविक उदहारण देता हूँ ---... मेरे एक परिचित हैं ,..ग्रामीण हैं ,...अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए बहुत जोर डालते हैं ,..मैंने उनसे पुछा ..आप किसी और विषय पर बच्चों से कुछ क्यों नहीं कहते ,..जब देखो अंग्रेजी -अंग्रेजी ....... उनके जबाब ने मुझे सन्न कर दिया ......उन्होंने बताया कुछ साल पहले उनको अंग्रेजी ना आने की वजह से दो अच्छी नौकरियां छोड़नी पड़ी और उनका स्वप्न टूट गया ,...अतः अब कुंठा है,.... कहीं बच्चे भी ना पिछड़ जाएँ ...मैंने उनको समझाया अब ऐसा नहीं है ,.सामान्य अंग्रेजी तो आनी ही चाहिए लेकिन हिंदी सबसे ज्यादा जरूरी है ,...........मेरे हिसाब से प्रतिभा किसी भाषा की मोहताज नहीं होती ,..लेकिन हर किसी के पास प्रतिभा भी नहीं होती ,...हिंदी को रोजगार से जोड़ना होगा ,....तभी कुछ ...बाबा रामदेव ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के सशक्तिकरण की बात की है ,...मैं उनका पूरा समर्थन करता हूँ ,......सादर आभार ,..अगली पोस्ट की प्रतीक्षा होगी

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

मित्र ; सच है हम संसद के सामने विवश हैं किन्तु संसद के इस मनमाने रवैये के कही ना कहीं जिमेदार भी हम ही हैं ! या तो हम वोट देने ही नहीं जाते या बिना सोचे समझे अपराधियों को वोट दे आते हैं ! अन्ना जी ने कहा है राईट तो रिजेक्ट लाओ किन्तु वह तो आज भी दुसरे रूप में है हमारे पास उपलब्ध है ! इसका सबसे अच्छा उदाहरण कुछ वर्षों पुर्व मध्य प्रदेश के कटनी में एक बृहन्नला को वहां के मतदाताओं द्वारा विधायक के लिए चुना जाना है ! मैं केजरीवाल जी के इस मत से सहमत नहीं हूँ कि चुनाव प्रत्यासियों में सभी अपराधी पृष्ठभूमि के लोग ही मैदान में होते हैं और किसी एक को चुनना हमारी विवशता ! क्योंकि विगत वर्षों से किसी भी संसदीय चुनाव में केवल २ या ३ उम्मीदवार मेरी जानकारी में तो नहीं रहे ! हाँ यदि केवल कांग्रेस , भाजपा , सपा जैसे दलों के प्रत्याशियों को ही ना गिनकर निर्दलियों को भी प्रत्यासी गिनें तो ! एक तरफ आप आम आदमी कि वकालत कर रहे होते हैं दूसरी और उसी आम आदमी को निर्दलीय चुनाव लड़ने पर अयोग्य मान उसपर विचार करने से भी इनकार ! यानी यदि आपके मन में सच्ची राष्ट्रभक्ति , सच्ची समाजसेवा कि भावना है भी तो पहले हथकंडों को अपनाकर प्रसिद्धि पाओ ! भले नरसंहार कर चम्बल के बीहड़ों की शोभा बनो फिर शान से आत्मसमर्पण कर खुली जेल/ आम माफ़ी पाओ फिर चुनाव लड़ सांसद बन जाओ और फिर अपने मन की प्रबल इच्छा समाजसेवा करो ! या चुप बैठो या मुंह खोलो तो सकुटुम्ब प्रताडनाओं को सहने की तैयारी पहले कर लो ! या सेहला मसूद जी , हरेन्द्र पंड्या जी की तरह इनकी साजिश की भेंट चढ़ जाओ जिसमें सजा की इतिश्री किसी छुटभैये शूटर को जेल भेजकर कर दी जायेगी ! जब तक हम भारतीय नहीं जागेंगे कई सेहला मसूद , हरेन्द्र पंड्या हमारे लिए मरकर भी केवल हमारी तारीफ़ के लायक नाम ही बन सकेंगे बस ! मेरी समझ में नहीं आता हम जिनकी जिस बात के लिए तारीफ़ करते है उसका अनुसरण क्यों नहीं कर पाते ! यदि अनुसरण योग्य नहीं है तो तारीफ़ किस लिए कर रहे होते हैं ! माफ़ कीजिये ये शब्द आपके लिए नहीं वर्ण उस प्रसंगवश लिखा गए जो सामने है ! जय हिंद !

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

मित्र ; यदि बात कसाब की कर रहे हैं तो अभी कुछ और इन्तजार जरूरी है ! कसाब को आत्महत्या से रोकने उसपर २४सों घंटे निगरानी रखी जा रही है , पूरे कपडे पहनने इस आशंका से नहीं दिए जा रहे हैं कि कपड़ों की मदद से ना मर जाए आदि आदि उसमें जीने की इच्छा जागने दीजिये कुछ और सच स्वीकारने दीजिये तब उसे सजाये मौत दी जानी चाहिए अभी तो इन्नामेमौत है उसके और उसके आकाओं के लिए ! किन्तु हम किसी पूर्व प्रधान मंत्री की ह्त्या के, संसद पर हमले के, निरीह लोंगों को निशाने बनाने वाले छुपकर वार (बम धमाके ) करने वाले कायरों के लिए सजा और माफ़ी की राजनैतिक बातें करते हुए जाने कैसी बेशर्मी ओड़ लेते हैं ! हममें से अधिकांश किसी ना किसी राजनैतिक दल के समर्थन / विरोध / श्रद्धा/ नफरत के पूर्वाग्रह पूर्ण भावों से ग्रसित होकर अलग अलग हुई एक जैसी घटनाओं पर अलग अलग राय रखता है ! मैं ( और हर सच्चा भारतीय ) किसी दल का किसी जन का ना तो हितैषी हूँ ना विरोधी मेरे लिए यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं कि लिट्टे ने किस दल के किस व्यक्ति को बम धमाके से उड़ाया मेरे लिए बहुत शर्मनाक है कि भारत के जेड प्लस सुरक्षा घेरे से घिरे पूर्व प्रधानमंत्री के साथ ऐसा हुआ ! और आज भी हमारे राजनैतिज्ञ केवल दलगत समर्थन और विरोध में लगे हुए हैं ! किसी भी आतंकवादी घटना का जिम्मेदार ठहराया गया कोई भी व्यक्ति ना किसी धर्म का मानने वाला हो सकता है ना सच्चा भारतीय वे इस्लामी जन जो इन सजा पाए लोंगों की हिमायत कर रहे हैं खुद इस्लाम को मुझ गैर इस्लामी से भी कम जानते हैं ! जैसे भारतीय मिट्टी के प्रभाव वश यहाँ जन्मा हर भारतीय मूलरूप से केवल ईमानदार होता है और सच तो यह है की ९० प्रतिशत भारतीय मरते दम तक मूलतः ईमानदार ही रहता है किन्तु मात्र १० % भ्रष्टों के इशारों पर अपनी आत्मा को कुचल बेईमानी का साथ देने विवश वैसे ही हमारे अन्य समाजविरोधी कामों को चुपचाप सहने / देखने/ देख कर अनदेखा करने हर आम आदमी विवश !

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राजकमल जी; जय हिंद ! जड़ आपकी योग्यता से अधिक दिलाने का लालच देकर पैसा मांगकर आपको सुविधा उपलब्ध कराने वाला नहीं ! स्वयं आप हैं ! क्योंकि या तो आपको अपनी योग्यता से अधिक चाहिए होता है ! या अपनी योग्यता को मापना नहीं आता ! या अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं होता ! या अधीरता या फिर अकारण ही ! मुझे [ सामान्य वर्ग ] मेरी शैक्षिक योग्यता के अनुसार भारत में उपलब्ध सर्वोत्तम विभागों में से तीन तीन उचित पद में से चुनने का अवसर बिना एक रुपया खर्च किये मिला ! मुझसे पहले मेरे पिता और दादा के साथ भी ऐसा ही हुआ ! मेरे बाद वाली पीढ़ी में मेरे बेटे को अभी अभी तीसरी कंपनी ने रोजगार देने चुना है ! ऐसा नहीं की हमें रुपये देकर अधिक पाने के अवसर या प्रस्ताव नहीं मिले ! ऐसे मिले प्रस्तावों को ठुकराने का साहस हमारे खून में है ! इसीलिये क्षमा कीजिये गलत घूसखोर उतना नहीं जितने कि आप ! जो सहर्ष देकर दुसरे का हक़ छीनने में विश्वास करते हैं ! फिर दूसरों का हक़ दूसरों को दिलाने का महापाप आजीवन करते/ करवाते रहने का कारण बनते हैं ! जहाँ तक सुधारों के तरीके की बात है पिछले लेखों में मैंने स्वयं स्पष्ट किया है कि सुधार केवल ऊपर से नीचे कि ओर संभव हैं ! किन्तु ऊपर के नीतिनिर्धारकों को चुनने वाले हम ही हैं ! फिर स्वयं को दोषमुक्त मानकर दूसरों पर अंगुली उठाना कहाँ तक उचित है ! आप ही बताएं ...... [राजकमल जी को केवल प्रतीकात्मक लक्षित ]

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जी शुक्लजी ; धन्यवाद् ! हर लेखक उत्तम विचारक स्वतः ही होता है ! वे तो बहुमुखी प्रतिभासंपन्न प्रेरणापुंज थे ! उनका [ मेरे लिए ] एक प्रेरक प्रसंग पढ़ने मिला जो ठीक तरह समझा नहीं जाने के कारण उद्धृत नहीं किया था इस प्रकार है - ७० वर्षीय गुरुदेव रोज सुबह ११ बजे के पहले अपने कमरे की खिड़की पर पंहुच बाहर सड़क पर एक १२ वर्षीय लडकी को स्कूल जाते हुए देखने प्रतीक्षा किया करते थे ! उनके एक मित्र ने भांपा और पूछा \'\'क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी / पोती दिखती है उसमें जो इतना व्याकुल रहते हो उसके लिए ? \" गुरुदेव ने कहा - \'\' नहीं ! वह अतिसुन्दर है... मुझे सौन्दर्य देखना अच्छा लगता है बस .... इसीलिये \" \'\' किन्तु किस रिश्ते की भावना से ? तुम्हारी पोती जितनी है वह ... \" \'\' माँ जितनी सुन्दर है वह ...... सौन्दर्य के प्रति श्रद्धा के भाव से ! उन्होंने चंद फीट दूर से गुजरती उस बच्ची को ना कभी आवाज दी ! ना बुलाकर बात की किन्तु जिस दिन उसके स्कूल की छुट्टी होती गुरुदेव को अपूर्णता लगती ! [ मेरा भी यही मानना है कि प्रत्येक रिश्ता श्रद्धा घटाता है !] \'\'

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प्रिय चर्चित चित्रांश जी आप के सारे तर्क ठीक है हमारा राष्ट्र गान कठिन है सब की समझ से बाहर है इसमें कुछ क्षेत्र को भी जोड़ा गया है तो कुछ छूट जाते हैं कुल मिलकर राष्ट्रिय एकता इसका एक उद्देश था सब एक हों किसी भी गाने किसी भी झंडे के तले -अपवाद हर जगह है कल कोई बोल सकता है इस झंडे को बदलो इसमें ये है वो है दुसरे देश का झंडा ठीक है आदि -इस के साथ हमारी आस्था जुडी हुयी है और इस तरह की चीजों को मुद्दा न बनाया जाये तो बेहतर होता है - अच्छा हो की जो आप ने कहा कुछ सरल सुन्दर देश गान को भी साथ में बाद में कहीं भी मंच पर स्थान दिया जाये अगर ये लोक प्रिय हो जाता है लोग इसे चाहने लगते है तब एक विकल्प आता है अन्यथा नहीं शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा:

एक बात बिलकुल ही समझ में नहीं आती की आलोचना के नाम पर घूम फिर कर सारी बाते सरकार के हिस्से में आती हैं क्या आपने कभी यह समीक्षा करने की कोशिस की है कि भारत और अमेरिका में पकिस्तान के रिश्तों में क्या बुनियादी अंतर है सामरिक दृष्टि से एशिया में अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए और चीन पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका को किसी न किसी को तो दोस्त बनाना पड़ेगा और इसीलिए पकिस्तान को वह अपने वैतनिक दोस्त के रूप में पालता है और अरबो डालर की सहायता देता रहता है इसीलिए उसने लादेन को पाकिस्तान के अन्दर फौजी कार्यवाही करके मारा जिसके खात्मे के लिए वह अब तक पकिस्तान को अरबों डालर का भुगतान कर चुका है ! अब रही बात भारत की तो भारत इस प्रकार की कार्यवाही करने में तो सक्षम है (जैसा कि जनरल वी के सिंह ने भी कहा है ) परन्तु क्या भारत के ऐसा करने में विश्व समुदाय भारत का साथ देगा यह तो बहुत दूर की कौड़ी होगी पर जो पकिस्तान समर्थक गद्दार किश्म के लोग देश के अंदर विराज मान है वे लोग क्या किसी कार्यवाही का समर्थन न भी करे पर क्या वह लोग शांत भी रह सकते है क्या देश दंगो की आग में नहीं जलने लगेगा – और पकिस्तान के साथ जैसी भौगोलिक स्तिथिति है वह आप भी जानते है – तीसरी बात पाकिस्तान जैसे बेहूदे देश से जो परमाणु शक्तिसंपन्न भी है से युद्ध की दशा में परमाणु हमले की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता – इस लिए भाई मेरे ऐसी कार्यवाहियों में भारत और अमेरिका की तुलना नहीं करनी चाहिए ? दूसरी बात यह की १९७१ हमारी फौजों इसी पाकिस्तान को चीर कर दो हिस्सों बाँट दिया था तथा लगभग एक लाख फौजियों को कई साल तक कैद में रख उन्हें दावत खिलाने के बाद समझौता होने पर वापस ही नहीं किया बल्कि जीती हुई जमीन भी वापस कर दी थी इस लिए युद्ध कोई विकल्प नहीं है हाँ सिमित कार्यवाही अवश्य करनी चाहिए ?

के द्वारा:

के द्वारा: charchit chittransh charchit chittransh

चित्रांश भाई, मैं आपसे सहमत ही हूँ| मैं भी इसी ओर ध्यान दिला रहा था कि राष्ट्र गान में बुराई नहीं है पर जिस के लिए संबोधन किया गया था इसमें वह वास्तव में कौन है| वही अधिनायक शब्द ही आज तक कचोटता चला आ रहा है| मैं यहाँ कुछ कहना नहीं चाहता था पर अब कहना ही होगा| गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर यह जानते हुए भी कि जिस कुल्हाड़ी पर वे धार लगा रहे हैं वो कल उन्ही के पाँव पर गिरेगी, उन्होंने इसकी रचना की| यह गीत सीधे सीधे जॉर्ज पंचम का प्रशस्ति गान था जो उस समय के ब्रिटिश चाटुकारों द्वारा ब्रिटेन के राजा के भारत आगमन के उपलक्ष्य में रचवाया गया था| और इस बात के भी प्रमाण हैं (अभी मेरे पास उपलब्ध नहीं हैं) कि गुरुदेव को नोबेल पुरस्कार गीतांजलि के लिए नहीं बल्कि इस रचना के बदले में दिया गया था| विस्तृत चर्चा फिर कभी, साभार, (यदि किसी को मेरे इन विचारों से असहमति हो या कष्ट हो तो मैं अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ)

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

भाई चित्रांश जी आपके लेख में दो मुद्दे है......अब समझ नहीं आ रहा की किस पर प्रतिक्रिया करूँ. अच्छा जी पहला मुद्दा ले लेता हु.......हमारे राष्ट्र गान का औचित्य क्या है........तो साब बात ऐसी है की इस गीत ने भारत की आजादी में कोई योगदान तो दिया नहीं.......बस इसे राष्ट्र गान बनाने में सम्मान की भेडचाल काम आई. कवी रविन्द्र को सम्मान देना था तो बना दिया......और वन्दे मातरम को सांत्वना पुरस्कार दे दिया राष्ट्र गीत के रूप में. जय हो तुस्टी कारन की नीति की. जन गन मन ब्रिटिश राजा के सम्मान में गाने के लिए लिखा गया स्वागत गीत था.......अब इस स्वागत गीत के मतलब आप स्वयं ही निकाल लो.......नहीं क्यों की उस समय तो पंजाब सिंध गुजरात मराठा द्रविण और बंग उन्ही की जय गाथा गा रहे थे...........फिर भी एक सार्थक मुद्दे को उठाने के लिए आभार एवं बधाई.....

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

वाहिद जी ; जय हिंद ! वाहिद जी मेरा विरोध राष्ट्रगीत से नहीं उसकी गुणवत्ता से है . मैं शपथपूर्वक कह रहा हूँ इस लेख में लिखी घटना की तरह मैं जीवन में आज तक कभी राष्ट्रगीत के वादन के समय सम्मान में खड़े होने से नहीं चूका हूँ किन्तु में इस कर्तव्य को करने वालों की अरुचि का कारण ढूँढना और प्रस्तुत करना चाह रहा था . जहाँ तक मेरा ज्ञान कहता है कोई भी धर्म अपनी मातृभूमि / मादरेवतन को सम्मान देने से मना नहीं करता किन्तु व्यक्ति विशेष की स्वार्थवश स्तुति हर धर्म में निंदनीय.... मैंने राष्ट्रगीत की क्लिष्टता और विवादास्पदता पर प्रश्न उठाये हैं किन्तु जब तक यह राष्ट्रगीत के रूप में मान्य रहेगा मेरा ह्रदय से इसके प्रति सम्मान देना निरंतर जारी रहेगा . राष्ट्रगीत के शब्दों में ही इसके साथ उठे विवादों का कारण उपस्थित है .हिन्दू होने और हिन्दी का थोडाबहुत ज्ञान होने के नाते ' अधिनायक ' शब्द को धर्मनिरपेक्ष रूप से सर्वशक्तिमान के लिए प्रयोग किये जाने का तर्क मन सहज स्वीकार नहीं कर पाता जबकि आगे ' विधाता ' हिन्दुओं का मान्य शब्द प्रयोग किया ही गया है . अधिनायक के शाब्दिक अर्थ तो ' प्रथम पंक्ति के /सफलतम नायक का ही भान कराता है . यदि थोड़ी देर के लिए इसका अर्थ ईश्वर मान भी लें तो भी पूरे गीत मैं उसी अधिनायक की वंदना है ना की राष्ट्र की .मेरे व्यक्तिगत मत में अपने अपने ईश्वर की आराधना /बंदगी अपने अपने धर्मों में पहले से मौजूद हैं ही जरुरत राष्ट्र की वंदना आराधना के राष्ट्रगीत के रूप में होने की है जिसके शब्द छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक सहज,सरस ,सरल और स्वीकार्य होने के साथ साथ ओजोमय, तेजोमय भी हों !

के द्वारा: charchit chittransh charchit chittransh

भाई राजकमल जी ; जय हिंद ! बहुत बहुत धन्यवाद् ! आपसे यहाँ संपर्क बना हुआ है, ख़ुशी है . आपके इ मेल पर आपके नाम सन्देश भेजना बाकी है , देरी के लिए क्षमा ! मैं मेरे विभाग से रिटायरमेंट पाने पिछले लम्बे समय से संघर्षरत हूँ जल्द ही पूरी तरह देश, समाज और हिन्दी / हिन्दी प्रेमियों के लिए समर्पित रहूँगा. एक मुनि श्री ही देश के अग्रणी गणमान्य में से है जिनका सुरक्षा घेरा उनके आशीर्वाद में वधक बन्ने वाला नहीं है . इसीलिये जरा सा प्रयास कर उनके इस चातुर्मास के समय उनसे स्वसासन के मूल संदेशों पर कृपा पूर्ण विचार का आग्रह करना संभव हो सका .उनने प्रतियाँ उनके पास छोड़ने का आदेश दे मौन आश्वासन भी दिया .आज जो आन्दोलन हमने देखा इसमें परोक्ष रूप से कहीं ना कहीं मुनि श्री भी सम्मिलित थे .वे वास्तविक संत हैं उन्हें श्रेय की आकांक्षा का तो प्रश्न ही नहीं उठता और मैं उनका अनुयायी.

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मेरा अपना अनुभव है कि हिन्दी लेखन के लिये 'फ़ोनेटिक हिन्दी राइटर' से बेहतर साफ़्टवेयर कोई नहीं हो सकता । गूगल या किसी भी ट्रांस्लिटर में ताम झाम बहुत होता है, जबकि आपरेशन निहायत ही असुविधाजनक होता है । जबकि फ़ोनेटिक हिन्दी राइटर को इंस्टाल करने के बाद बहुत थोड़ी प्रैक्टिस से ही सब कुछ आसान हो जाता है । मैनुअल (पीडीएफ़ फ़ाइल) को एक बार ध्यान से पढ़ लें बस । इसे डाउन करने के लिये गूगल सर्च में 'fonetic hindi writer download' टाइप करने के बाद साइट पर जाकर साफ़्टवेयर डाउन करें, इंस्टाल करें । आपके डेस्कटाप पर सफ़ेद 'अ' का आइकन बन जाएगा । जब हिन्दी में काम करना हो तो इसे डबल क्लिक करें, सिस्टम ट्रे में लाल 'अ' आएगा । अब एक साथ 'Shift'+'Pause' बटन दबाएं तो लाल 'अ' हरे में बदल जाएगा । आप हिन्दी टाइपिंग के लिये तैयार हैं । यहां तक कि किसी फ़ोल्डर को हिन्दी में रीनेम तक कर सकते हैं । फ़िर काम न हो तो उसी प्रकार दोबारा शिफ़्ट + पाज को एक साथ दबाने पर आइकन वापस लाल हो जाता है । उस लाल 'अ' को उसी तरह छोड़कर आप अपना नार्मल वर्क कर सकते हैं । जब कम्प्यूटर बन्द करना हो तो उसको राइट क्लिक कर एग्जिट कर जायं । दिक्कत होने पर बात करें या कहीं भी लिखें । धन्यवाद ।

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चित्रांस जी आप के द्वारा शुरू की गयी ये पहल हम जैसे लोगो के लिए बहुत ही उपयोगी होगी अंग्रेजी ज्ञान कम होने के कारण किसी भी चीज को जानने व समझने मे तमाम दिक्कते आती है ऐसे मैं किसी के द्वारा मार्गदर्शन मिल जाये तो सुगमता हो जाती है ; मेरे कमेन्ट हिंगलिश मैं नहीं हो पा रहे है बाजपेयी जी ने मेरी बहुत मदद की फिर भी अभी ठीक से नहीं लिख पा रहा हूँ अभी इधर उधर करके ये कैसे ठीक हो गया समझ नहीं पाया ; अभी आशंकित हूँ की आगे पुनः ऐसे लिख पाउँगा के नहीं .......चिन्त्तित हूँ ..मैं जब हिंगलिश क्लिक करता हूँ तो जंहा डन लिखा होता है वहा errar on page लिख जाता है और जब कुछ लिखो तो स्क्रीन के बीच मैं transletion server unreachable लिख जाता है अलग से कुछ और करना पढ़ता है क्या ....कृपया बताये .......

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के द्वारा: chaatak chaatak

राजकमल जी , सीधा साधा लिख कर सीधी साधी बात कहने वाला ही सुलझा हुआ नहीं होता आप जैसे शब्दों के धुरंधर भी उतने ही सुलझे हुए और उससे बढ़कर निश्छल होते हैं . आपकी शुरूआती प्रतिक्रियाओं और आपके२- ३ लेखों को पढ़कर ही मैं आपके निश्छल व्यक्तित्व को भांप चुका था . आपने प्रतिक्रियाओं में चुहल तो मेरे ब्लॉग पर भी की {होगी } किन्तु मेरे प्रत्युत्तर आपको स्तर बनाए रखने पर विवश करते रहे होंगे ? कोई भी पहल करने वाला स्वाभाविक रूप से अपनी स्टाइल में ही पहल करेगा. जो दूसरे को पढ़ते हैं वो ही प्रतिक्रिया करते हैं और दूसरों को पढ़कर अपने आपको आंकते भी है किन्तु ..... आप यदि प्रतिक्रिया में कोई ब्लॉग पोस्ट करते हैं तो आपको सीधे या सांकेतिक व्यक्तिगत होना ही पड़ेगा जो मेरे मत में उचित नहीं रहेगा. हाँ यदि सामान्य समालोचनात्मक लेख लिखें तो सभी स्वागत करेंगे में भी ! वैसे भी आप तो व्यंग की विधा के अनोखे कलमकार हैं. आप स्वयं जानते हैं कि एक दूसरे पर जितना कीचड़ के बदले कीचड़ उछलने का प्रयास किया जाएगा दोनों पक्ष उतने ही कीचड़ में सनते जायेंगे .छोडिये ख़राब सपनों को हम नींद से जाग नयी सुबह का नए जोश से स्वागत करने तत्पर हों !

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इस लेख पर आपकी एक प्रतिक्रिया मेरे डेशबोर्ड पर भी है ,में कल येही लिखते लिखते रह गया था कि भाई राजकमल इतने लेख कैसे पढ़ पाते हो प्रतिदिन ? जहाँ भी जिस भी ब्लॉग को खोलता हूँ आपकी सटीक प्रतिक्रिया पहले से मौजूद रहती है ! इतने सक्रिय ब्लोग्गर से सारा जाज प्रशन्न रहे ऐसा होना संभव नहीं है अतः आप मन छोटा करने के वजाय अपनी गति शीलता बनाए रखिये .यदि किसी आरोप के कारण मैदान छोड़ने {प्रतिक्रियाओं में कमी करने } की सोच रहे हैं तो एक बार यह जरूर विचारिये कि इस तरह तो सोनियां गाँधी को देश , अटल जी को राजनीती , बाबा रामदेव को औषधि निर्माण आदि आदि कभी का छोड़ देना चाहिए था . ज्यादह मत लिखवाइए अन्यथा कल मुझ पर भी ......

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दीपक जी , नमस्कार ! सर्वप्रथम प्रतिक्रिया का धन्यवाद् ! तदुपरांत आपकी भड़ास का एक महत्वपूर्ण अंश की में भी इस पर लिखने वाला था किन्तु .... हम लोंगों में से सभी की कलम में जोश है जरुरी नहीं कि जिस समय जो विचार मेरे मन में आयें उस समय या उससे पहले ही किसी और के मन में ना आये हों . यदि आपने मेरा लेख नहीं पढ़ा होता तो लगभग यही बांतें आपके ब्लॉग पर भी होतीं .इसका यह अर्थ तो नहीं कि आपकी मौलिकता में कमी थी . एक साथ एक ही विचार दुनियां में कई व्यक्तियों के मन में आ सकता है एक उदाहरण देना चाहूँगा-चेचक के टीके कि खोज दुनियां भर में जोरशोर से चल रही थी . पश्चिम बंगाल के एक डाक्टर ने भी वाही निष्कर्ष निकाले जिनकी खोज का श्रेय अल्फ्रेड जेनर को मिला कारण था पिछड़ी संचार व्यवश्था . जिस समय वे बंगाली डाक्टर अपनी खोज का शुभ समाचार अपने मित्र को सुनाने जा रहे थे रेडियो पर अल्फ्रेड जेनर कि खोज कि खबर प्रसारित कि जा रही थी .हो सकता है किसी और ने भी सफलता उसी दिन पाई हो किन्तु इससे बंगाली डाक्टर की ईमानदारी पर तो शक करना अनुचित होगा ना ! भले उन्हें श्रेय नहीं मिला किन्तु थे वे भी सफल ही !

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\"भ्रष्टाचरण से कमाया जाने वाला प्रत्येक रुपया किसी ना किसी का हक़ छीन किसी अयोग्य को दिए जाने का कारण होता है जाने कितनों का जीवन इन भ्रष्टाचारियों के लालच की भेंट चढ़ नरक बन चुका होता है या समाप्त हो चुका होता है .\" - कालेधन की दुनिया बहुत बड़ी है । इसमें न सिर्फ सरकार से छुपाई गयी रकम आती है बल्कि सामाजिक, राष्ट्रीय और आर्थिक अपराध द्वारा कमाई गयी रकम भी आती है । इसके बाद इस काली कमाई को रियल स्टेट, शेयर, मेटल, हथियार, राजनीति, चुनाव आदि में लगाकर दुगना, तिगुना, ................सौ गुना किया जाता है । धीरे धीरे यह रकम कालेधन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर देती है । कालेधन की रकम पाप से शुरू होती है और पाप की लंका खड़ी करने तक जाती है । विदेशों मंे जमा कालाधन तो इसका सिर्फ एक हिस्सा है । वास्तव में भ्रष्टाचार और अपराध से पैदा हुआ यह राक्षस धीरे धीरे विकराल स्वरूप ले लेता है और किसी भी तंत्र को, लोकतंत्र को भी नष्ट कर देता है । आज भारत में यह खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है क्योंकि सरकारें कालेधन की मदद से बन रही हैं और कालाधन सरकारों की मदद से अपना आकार बढ़ाता जा रहा है । हम अंग्रेजी सत्ता से बहुत खतरनाक कालेधन की सत्ता के सामने खड़े हैं और आश्चर्य है कि अभी तक अपने दुश्मन को पहचान भी नहीं पायें हैं जो कि थोड़ा या अधिक मात्रा में हम सबके अंदर मौजूद है । आभार ।

के द्वारा:

चित्रेश जी, इस मंच पर पिछले दो दिनों में मैंने दो घटनाये ऐसी देखी जो सिर्फ चुहलबाजी के कारण रिश्तो में दरार का कारण बना . मै अपने आप को लेखक नहीं बल्कि पाठक मानता हु और इस मंच के लगभग सभी लेख नियमित पढता हु कुछ को कई बार पढता हु , साथ ही टिप्पणियों को भी पढता हूँ . मुझे बड़ा क्षोभ हुआ . क्योकि , मै आप ब्लोग्गेरो को लेखक मानता हूँ साथ ही यह सोचता लेखक का बौद्धिक स्तर आम लोगो से ऊपर होता है, पर यहाँ तो अर्थ का अनर्थ कर के लोग बच्चो की तरह लड़ रहे है. मै आज इस पर लिखने वाला था पर आपके लेख पर टिप्पणी कर के ही दिल की भड़ास निकल रहा हूँ. समय है आप लोगो को बौद्धिकता का परिचय देने की और टिप्पणी देते वक्त मर्यादा का परिचय देने की . आपकी टिप्पणी लेख पर हो न की व्यक्तिगत . और सबसे बड़ी बात जो मुझे समझ आई इन झगड़ो का कारण की कुछ लोग रिजर्व होते हैं तो कुछ जल्दी घुलने वाले . तो यह सबको समझना होगा. पुनश्च , इन घटनाओ से एक आम पाठक को बहुत दुःख होता है जो इन्हें अपना आदर्श मानता है अत इस पर जल्दी कुछ करें और रोक लगायें.

के द्वारा: deepak pandey deepak pandey

priy chitraansh ji .....nmskaar ! आपका यह लेख बहुत ही सही समय पर आया है .......आज इस मंच को आपके जैसे विद्वान की तरफ से ऐसी ही किसी पहल की सख्त जरूरत महसूस हो रही थी ....... बस मैं थोड़े शब्दों में बस यही कहना चाहता हूँ की हमको सार्थक मनोभाव रखते हुए खुले दिल + दिमाग से मर्यादित आचरण करना चाहिए ...... क्योंकि कई बार ऐसा होता है की आप कहना कुछ चाहते है औए सामने वाले के पास वोह किसी और अर्थ में पहुँचता है ...... वैसे मेरे साथ यह समस्या शुरू से ही रही है ...... लेकिन अब किसी हद तक ठीक हो चुकी है ...... फिर भी यदा कदा यह अपनी उपसिथ्ती का एह्सास करा ही देती है ..... आगे भी आपसे ऐसे सार्थक मार्गदर्शन देने वाले लेखो की अपेक्षा रहेगी ..... बहुत -२ धन्यवाद

के द्वारा: rajkamal rajkamal

राजकमल जी , धन्यवाद् ! आखिर आपकी प्रतिक्रिया मिली , पिछली बार "आप चूकते नहीं " आपकी निरंतरता की प्रशंशा में लिखा था उसी दिन से आपकी प्रतिक्रियाएं नहीं आ रहीं थीं . आप व्यंग रचना के धनी हैं वैसी ही आपकी प्रतिक्रियाएं भी होती हैं . अच्छा लगता है सब नहीं समझ पाते होंगे आप तारीफ़ कर रहे है या खिंचाई . प्रतिक्रिया सदैव अनुकूल ही हो आवश्यक नहीं है . अनुकूल प्रतिक्रिया पर धन्यवाद् से अधिक और कुछ व्यक्त करना कठिन होता है जबकि प्रतिकूल पर स्पष्टीकरण के रूप में एक बार फिर अपने आपको प्रस्तुत करना आसान हो जाता है . यदि आप और यहाँ के अन्य प्रतिष्ठित लेखक अज्ञानी होते तो ना तो अच्छा लिख रहे होते ना ही किसी और को पढ़ रहे होते . आप और हम जो भी लिखते हैं वह केवल आपस में पढ़ने के उद्देश्य को दृष्टिगत रख नहीं वरन सार्वजानिक रूप से लिख रहे होते हैं . प्रतिक्रियाएं भी पढ़ी जाती हैं . आपके ब्लॉग पर लिखी प्रतिक्रिया केवल आपके लिए ही नहीं उसमें सामान्य सन्देश जनसामान्य को दृष्टिगत कर लिखे गए . आप जैसे बेस्ट सेलर के ब्लॉग पर प्रतिक्रिया में लिखने का अवसर मेरे लिए सौभाग्य है . यदि आप मेरी कहीं भी किसी भी रचना या प्रतिक्रिया से आहत अनुभव करते हैं तो मैं ह्रदय से क्षमाप्रार्थना करता हूँ . आपके अपने अंदाज में प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा रहेगी . आशा है आप आगे भी नहीं " चूकेंगे " !

के द्वारा: charchit chittransh charchit chittransh

मिश्र जी , आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् ! किसी नेता विशेष या किसी दल विशेष के किसी घोटाले विशेष की ही बात नहीं है ,हमारे देश का भाग्य ही सत्ताधीशों द्वारा लूटा जाना है . फिर चाहे सत्ता मुगलों की रही हो या अंग्रेजों की या हमारे तथाकथित लोकतंत्र की . आज़ाद भारत के राजनीतिज्ञ पिछले अंग्रेजों से भिन्न नहीं लगते . कारण है हम मतदाता जो लोकतंत्र के सबसे मजबूत आधार होने चाहिए किन्तु हैं सबसे कमजोर ! हमारी लालच और मजबूरी से जन्मी कमजोरी और अकर्मण्यता खुद हमारे ही विरुद्ध प्रयुक्त होती रही है फिर भी हम जागने तैयार नहीं बस उनींदे हो बडबडाते रहते हैं जागकर कोई कदम उठाने की सोचते भी नहीं .ऐसे में धूर्त मतलबपरस्त नेताओं की चांदी है .वे अपनी बेईमानी से भरी लूट की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं और हम हमारी जिम्मेदारी से भागे जा रहे हैं . हमारी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार अन्य पहलू "मेरा राज देश पर तो देश का दुनियां पर " के प्रथम भाग {परिचय -स्वसासन} में अवश्य देखिये. आक्रोशपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए पुनः धन्यवाद् ! चर्चित चित्रांश

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के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

चित्रांश जी ! आपकी इस रचना में भावों का आवेग, कुछ सोचने के लिए बाध्य कर देता है | सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए बधाई ...... ------------------------------------------------------------------------------------------------------------- इसी क्रम में मेरा बस इतना ही कहना है .. -------------------------------------------------------------------------------------------------------------- जलनिधि चंदा करते हैं निष्कर्ष हीन कुछ बातें , रह जाएँ बाकी बातें , कट जाएँ लम्बी रातें| --- कैसी इनकी प्रत्याशा , कैसी इसकी परिणति है , है कठिन समझना इसको, आकर्षण या संसृति है | --- जब अनिल वेग से आकर , अंतस्तल छू कर जाए , स्पंदित अंतस तल पर , अगणित लहरें बन जाए | --- त्वरित लहर में फंस कर सीपी बाहर आ जाते , जब लहर चली जाती है, प्यासे तट पर रह जाते | ---- धवल कान्ति से मन जो, सम्मोहित कर लेते हैं, जब रात चली जाती है , हा ! ज्योति मलिन करते हैं | ---- खाली मंदिर में कोई अर्चन को जब जाता है , बावला लोग कहते हैं , तो निष्ठा बतलाता है | ---- डूबे भी प्यासे रहते , ये तृष्णा के उपक्रम हैं , क्यों मूल समझ ना पाए, संसृति के जटिल नियम हैं | --- एक उंचाई की सीमा , एक गहराई की सीमा , दोनों की अपनी गरिमा , दोनों की पृथक प्रकृति है

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

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